अल्हड़ बारात - लघुकथा - डॉ. राम कुमार झा "निकुंज"

मोहन बहुत ही मेधावी छात्र था। उच्चतम शैक्षणिक सफलता के बाद भी उसे योग्यतानुसार जीविका न मिल सकी। परिवार की स्थिति दयनीय और बड़े परिवार के बोझ से लदे होने के कारण उसे नवोदय विद्यालय में शिक्षक की नौकरी करनी पड़ी। सरकारी नौकरी थी, अतः शादी के लिए लड़की वालों का आना जाना शुरु हो गया। इच्छा न होते हुए भी उसे विवाह के लिए राज़ी होना पड़ा। लड़की पढ़ी लिखी थी। पहले समाज में लड़की देखने की प्रथा न थी। सिक्किम में वह कार्यरत था। अतः लड़की पक्ष के कुछ पारिवारिक वरिष्ठ सदस्यों ने लड़के के पिता से मिल कर सब विचार विमर्श कर लिया था।

चूँकि मोहन पटना दिल्ली आदि शहरों में ही पढ़ा लिखा था, अतः गाँव के युवाओं से विशेष परिचित न था। अतः विवाह की व्यवस्था और बारात आदि का गमनागमन सब मोहन के छोटे जीजाजी कर रहे थे। मोहन का वंश उच्च ब्राह्मण की श्रेणी में अपने को मानता था, और जहाँ शादी ठीक हुई उसे अपने से छोटा ब्राह्मण मानता था। अतः विष्णुपुर का ब्राह्मण समाज के वरिष्ठ लोग मोहन की शादी में बाराती सदस्य बन कर नहीं गए। मोहन का ससुराल भी कौलिक, समृद्ध और सुशिक्षित था। विवाह केवल मोहन की उच्च शिक्षा व व्यक्तित्व पर ठीक हुआ था। पूरे समाज में मोहन की प्रतिष्ठा थी। समाज के लोगों ने अपने परिवार के युवाओं को मोहन की बाराती में भेजा। यह बात मोहन को पता नहीं था। लड़की वाले ने कोच बस की व्यवस्था की थी। उधर से कोई दिक्कत न थी। स्वागत सत्कार सब उच्च स्तरीय थे। किन्तु अल्हड़ युवापन का अहंकार और श्रेष्ठ कुलीनता और शिक्षित होने का युवा दंभ वहाँ आए वरागत और कन्यागत पक्ष के कुछ ख़ुराफ़ाती शिक्षित लोगों के बीच शास्त्रार्थ विवाद का कारण बन गया। कुछ उचक्के वरपक्ष के युवा शादी के मंडप में लुका-छिपी करने लगे, उससे माहौल और गर्म हो गया। कन्यापक्ष के एक दबंग प्रतिष्ठित शिक्षाविद् रिश्तेदार ने उनकी हरकतों को देख उन्हें बाँधने की बात मज़ाक में कही, कुछ पढ़ाई लिखाई विषयक प्रश्न भी पूछे। किन्तु पहले से सी क़लह और व्यवधान को मन में संजोए सात आठ युवा भड़क गए और उसे अपना अपमान मान वहाँ से भाग गए। कन्यागत पक्ष के लोगों ने उन्हें मनाने, समझाने और क्षमादान करने की प्रार्थना की, किन्तु वे लौटे नहीं। पूरा विवाहस्थल उनकी बदतमीज़ी और उद्दंड मिथ्या अहंकार की निन्दा कर रहा था। 

बिना बाराती भोजन किए वे सभी अपने दुर्व्यवहार के कारण रात भर भूखे रह गए। मोहन को इन घटनाओं का कानोंकान ख़बर न लगी। प्रातःकाल मोहन को जब इस बात का पता चला तो वह अपने रिश्तेदारों की कुत्सित आचरण से शर्मसार था।

डॉ. राम कुमार झा "निकुंज" - नई दिल्ली

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