एक वृक्ष की पीड़ा - आलेख - संजय राजभर "समित"

मैं वृक्ष हूँ। प्रकृति का फेफड़ा हूँ, मैं निःसंदेह निःस्वार्थ भाव से प्रकृति के संचालन में अनवरत अथक संघर्ष करता हूँ। फल-फूल, छाँव, लकड़ी, दवा सबकुछ देता हूँ। मिट्टी का क्षय रोकता हूँ। वातावरण से कार्बनिक चीज़ें सोख लेता हूँ। 

मनुष्य लोभी है मेरे साथ तारतम्य बैठाने की जगह जानबूझकर स्वार्थी हो गया, अंधा हो गया, भटक गया अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने लगा। यदि दम न घूँटता तो यह मेरा अस्तित्व ही समाप्त कर देता। खाँस-खाँस कर बेहाल है पर रोज़ टँगारी मुझ पर चला रहा है प्रमुदित भी है, इसे नादान कहूँ या पागल, नही नही.. यह निरा लम्पट है सुनता कहाँ है।

मैं इसका साथ गर्भ से लेकर मृत्यु के बाद भी देता हूँ पर धोखेबाज़ है। जब एक पौधा लगाता है तब तस्वीरें दुनिया को दिखाता है, वाहवाही लूटता है फिर मैं सूख जाता हूँ, मैं अदृश्य हो जाता हूँ। मेरा कोई ख़बर नही लेता पर सरकारी काग़ज़ों में हरा-भरा बाग रहता हूँ, हजारों एकड़ में फैला रहता हूँ। मजे की बात देखिए पर्यावरण दिवस मना रहा है मेरे रख रखाव में वर्षों तक वेतन ले लेता है।

अब मुझे मत काटो, जंगली जानवरों को समूल नष्ट मत करो। बेचारे गाँव में पहुँच रहे हैं तो तू चिढ़ रहा है, गजब की ढीठता है। उजाड़ भी रहा है आँखें भी दिखा रहा है। ऐ! जानवरों तुम अपने क्षेत्र में रहो, दो मुँहा है मानव।
शुद्ध हवा चाहिए तो मुझे बचाइये। 

संजय राजभर "समित" - वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

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