आज का दौर - कविता - सूर्य मणि दूबे "सूर्य"

आज के दौर की बातें कर लें
जुबा कुछ कहती कुछ दिल नें छुपाई  है
किसी की टोपी किसी के सर,
किसी और ने पहनाई है,
किसी का प्यार, किसी की पसन्द
सच तो ये है, किसी और की लुगाई है 
मुद्दे कितने अजीबोगरीब, अजब यहाँ लड़ाई है।

कुछ नौजवानों को आये दिन मोहब्बत का रोग लगता है
आये दिन टूटते हैं दिल, बडा़ विस्फोट लगता है
जिगर पर जुल्म काफी था, बदन पर चोट लगता है 
सूजनें मिटती नहीं, खरोंच पर खरोंच लगता है।

कुछ कर गुजरने की कवायद कब शान्त होती है
अनचाहे अजनबियों से रहों में मुलाकात होती है
दिल की बात कहनें को, दिल से आवाज होती है
कभी सुर मिल भी जाते हैं कभी नाराज होती है।

जब कभी गुलाब के गुलिस्ते लेकर निकलते घर से
कभी हाथों में लड्डू कभी आँखों में प्याज होती है
कभी कभी नर्म गालों से, पटाखो की आवाज होती है
हर दफा कुछ नयी दफाए लगती हैं लेकिन
आखिरी हार चढ़ने तक हौसले की नहीं हार होती है।
किताबों के नाम पर कुडियों के बस्ते में
मेकअप बाक्स होता  है
लंच बाक्स में इनके सैंडविच हाट डाग्स होता है
आजकल के लिपिस्टिक का चलन कमाल होता है
पुराना गुलाबी अब तो काला पीला सतरंगी लाल होता है।
कभी कभी कर्ल जुल्फों का कहर उलझता है इस कदर
दीवारों से चिपका कोई मकड़ी का जाल होता है
कांटों पर चलना तो इनने सीखा है
आखिर पेंसिल हील पर बलखाकर चलनें का अजब जुगाड़ होता है।

गालों पर पाउडर की परत जब उतरती तब दु:ख
खूबसूरत सांपो को भी आखिर केचुली से प्यार होता है ,
अब बच्चों को चुप कराने को मां नहीं गाती है लोरी
अपनी एंड्रॉयड मोबाइल पर उसको ऐतबार होता है।
बाप के कन्धों पर नहीं अब घूमते बच्चे
चार पहिए के खिलौने का कारोबार होता है
कपड़े सिलकर पहने का नहीं है ये दौर
फाड़कर फैशन का नया दीदार होता है।
आज का दौर देखो दिखता हे अजीब
जहाँ भी नजरें हटी बस दो का चार होता है
आज के दौर की मोहब्बत का नहीं कोई ठौर
बेकरारी दूर होने तक का ही बस करार होता है
तैरना न सीखा बस डुबोना जाने,
आज के दौर में वही उस पार होता है।।

सूर्य मणि दूबे "सूर्य" - गोण्डा (उत्तर प्रदेश)

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