रवि रंजन कुमार - मुज़फ़्फ़रपुर (बिहार)
मेरा नाम बदल देना - हास्य-व्यंग्य - रवि रंजन कुमार
शनिवार, अक्टूबर 03, 2026
छुटपन में कुछ बच्चों को "माँ की कसम" खाने की आदत पड़ जाती है। वे अधिकांश ऐसे ही कसमें खाते पैदा नहीं होते, कभी-कभी अपनी झूठी बातों को मनवाने के लिए "माँ की कसम" खा लेते होंगे। पर माँ मरने के बजाय जिए जाती है। यहीं से उन्हें एक ऐसा ब्रह्मास्त्र मिलता है, जिसका प्रयोग वे हर ऐसे समय कर सकते हैं, जब लोग उन पर बिल्कुल भी भरोसा न करने की स्थिति में हों।
समय बीतता है और लड़का बड़ा होता है। इन बीते वर्षों में उसकी माँ की तंदुरुस्ती को देखते हुए समाज और मोहल्ले के "कसम-पीड़ित" लोगों द्वारा उसे झूठा, चोट्टा, बनोल इत्यादि तरह के नाना प्रकार के नामों से बुलाया जाने लगता है। अब चूँकि उस आदमी के पास बहुतेरे नाम हो जाते हैं, तो वह एक नया पैंतरा बदलता है—"मेरा नाम बदल देना"!
अब वह अपनी बात मनवाने के लिए अपने नाम को आपके पास गिरवी रख देता है। कौन-सा नाम गिरवी है, ये आप स्वयं निर्णय कर लें। वह कहता है, "अगर फलाँ बात मेरे कहे अनुसार न हुई तो मेरा नाम बदल देना।"
ऐसी परिस्थिति में वह आपको नाम रखने की खुली आज़ादी दे देता है। आप अपनी सोच के निम्नतम स्तर पर जाकर एक भद्दा, भोंडा और अश्लील नाम चुन सकते हैं।
हमारे समाज में ऐसे कई नामों के आविष्कार हुए हैं, जो आएदिन लोगों की ज़ुबान पर बैठे रहते हैं। ऐसे नाम आपको किसी सरकारी काग़ज़ात, आधार कार्ड या फिर जन्म प्रमाण पत्र पर नहीं मिलेंगे। इनका ठिकाना लोगों की ज़ुबान पर है। वहीं से निकलते हैं और आपके कानों से होते हुए फिर आपकी ज़ुबान पर बैठ जाते हैं।
ऐसे लोगों को आप हल्के में नहीं ले सकते। ये बड़े-बड़े बकुला विद्वानों, टिप्पणीकारों और मोहल्ला स्तर पर राजनीतिक प्रवक्ताओं की बोलती बंद कर देते हैं। क्योंकि इनके पास अपने नाम को बदलवाने की शर्त पर अपनी बेबाक राय रखने की खुली छूट होती है, जो बाक़ी लोगों के पास नहीं है।
बाक़ी लोग डरपोक हैं। उन्हें डर है कि अगर उनकी बात ग़लत हुई तो फिर क्या होगा? वे इस निर्मोही समाज को अपने नाम के साथ खुली छेड़खानी की इजाज़त नहीं दे सकते।
एक ऐसा व्यक्ति, जो सारी उम्र यह मानकर चलता है कि उसकी थोड़ी इज़्ज़त है और उसके नाम की भी, अपना नाम बदलवाने के मामले में इतना गंभीर हो सकता है कि वाद-विवाद की खुली महफ़िल में वह उस शख़्स के आगे आत्मसमर्पण कर दे और उसके ग़लत होने का अगले कई महीनों तक इंतज़ार करे।
अपने नाम को बदलवाना वाकई में एक गंभीर विषय है। इसका ऐतिहासिक आकलन किया जाए तो मालूम होगा कि द्वापर युग में पांडवों ने अपना सबकुछ दाँव पर लगा दिया था, यहाँ तक कि अपनी बीवी को भी! पर तब भी उन्होंने अपने नाम को बदलने की शर्त नहीं रखी थी।
कल्पना कीजिए कि अगर पांडवों ने वाकई में ऐसी शर्त रख दी होती और फिर नाम रखने की ज़िम्मेदारी दुर्योधन के मज़बूत कंधों पर आ जाती! फिर क्या होता?
जो भाई सौ भाइयों में सबसे बड़ा हो, साथ ही नीच और कपटी भी हो, वह कैसे-कैसे और कितने नाम रख देने की क्षमता रखता था, ये सोचकर ही डर लग रहा है।
दुर्योधन लगभग ऐंठते हुए—
"भैया युधिष्ठिर, नाम तो बदलने पड़ेंगे।"
युधिष्ठिर शांत एवं लज्जा के भाव से—
"अरे दुर्योधन, समाज और लोकलज्जा को ध्यान में रखते हुए रखना।"
दुर्योधन—
"आज से—
युधिष्ठिर → झूठिष्ठिर
अर्जुन → मछलीमार
नकुल → नाजुक कुमार
भीम → भोपुमल
सहदेव → मौनी बाबा
के नाम से जाने जाएँगे।"
वह रोज़घंटे के हिसाब से नाम बदल देता और पांडवों को चिढ़ाता। महर्षि व्यास भी कंफ्यूज हो जाते पात्र का नाम लिखने में। ऐसे में महाभारत लिख पाना कितना मुश्किल हो जाता! या यूँ कहें कि भारत का इतिहास ही बदल जाता।
अब सवाल ये है कि ऐसा आदमी अपने नाम बदलने के रिस्क के साथ कितनी तरक़्क़ी पा लेता है। तो ऐसे लोगों की तरक़्क़ी की कोई सीमा नहीं है।
सबसे निचले पायदान पर बैठा एक आम बेरोज़गार, जो अपनी कल्पनाओं के पंख पर बैठकर राजनीति में जुआ खेलने का शौक़ीन होता है, कहता है—"इस बार अगर फलानी पार्टी नहीं जीती तो मेरा नाम बदल देना।"
उसकी पसंदीदा पार्टी का राजनेता आपसे हसीन वादे करता है और जो वादे पूरे नहीं हुए तो—"उसका नाम बदल देना।"
बड़ा साहब और उसके बाबू आपसे काम करने का वादा करते हैं। जो गर पूरे नहीं हुए तो—"उनका नाम बदल देना।" ये फ़ेहरिस्त काफ़ी लंबी है।
वैसे ऐसे लोगों में थोड़ी तो सच्चाई है, क्योंकि कम से कम झूठ बोलने के लिए अपना नाम बदलवाने का रिस्क तो लेते हैं। यहाँ तो कई कंपनियाँ अपना सामान बेचने के लिए झूठ की पराकाष्ठा को पार कर वादे कर जाती हैं।
फेयरनेस क्रीम वाला विज्ञापन कहता है—"इन्हें लगाओ तो सात दिन में गोरे हो जाओगे।"
डिटर्जेंट वाला विज्ञापन कहता है—"एक धुलाई में सारे दाग़ ग़ायब।"
इसका एक विज्ञापन ऐसा भी आता है जिसमें बच्चा कीचड़ से लथपथ घर पहुँचता है और उसके टीवी वाले माँ-बाप यह देखकर ख़ुश और गौरवान्वित होते हैं, क्योंकि उनके पास वह विशिष्ट डिटर्जेंट है!
हमारे वास्तविक जीवन के माँ-बाप का भी टैगलाइन वही है—"एक धुलाई में सारे दाग़ ग़ायब।" फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि धुलाई कपड़े की नहीं, बच्चे की होती है।
दुर्गंधनाशक द्रव्य वाले कहते हैं—"लगाते ही सब आपके पीछे भागेंगे।"
हेल्थ ड्रिंक वाला विज्ञापन कहता है—"दोगुनी तेज़ शारीरिक बढ़त, तिगुना तेज़ दिमाग़।" मानो हेल्थ ड्रिंक न हुआ, आइंस्टीन बनाने का फॉर्मूला हो गया।
कई हेल्थ ड्रिंक वाले तो इसे पिलाकर बिजली पैदा कर देते हैं। इसे पीने वाला नौजवान बिना मेट्रो, टेम्पो या मोटरकार के सहारे ध्वनि की गति से भी तेज़ घर से सिनेमा हॉल पहुँच जाता है, साथ में लड़की को भी ले जाता है। इस पर बूढ़े माँ-बाप को बैठाया जा सकता है या नहीं, इस पर शोध चल रहा है!
हेयर ऑयल का विज्ञापन कहता है—"15 दिन में नए बाल उगने लगेंगे।" इस विषय पर मैं कुछ नहीं बोलूँगा! इसका आकलन गंजे ख़ुद ही कर लें।
कभी शेक्सपियर ने पूछा था—"नाम में क्या रखा है?"
उस समय उन्हें ये नहीं पता था कि एक दिन दुनिया में विज्ञापन नाम की चीज़ आएगी, जो किसी वस्तु के नाम को भरोसे, भ्रम और बिक्री की तिकड़ी से इतना बड़ा बना देगी कि लोग हास्यास्पद वादों को देखकर और सुनकर भी ख़रीदेंगे कि कहीं फ़ायदा हो जाए!
शेक्सपियर साहब को क्या पता था कि आने वाले समय में नाम ही सबसे सस्ता गिरवी रखने वाला सामान होगा। बस शर्त इतनी है कि आदमी के पास नाम बदलवाने का साहस हो और सामने वाले के पास नया नाम रखने की कल्पनाशक्ति।
और शायद इसी वजह से शेक्सपियर साहब का सवाल—
"नाम में क्या रखा है?"
आज फिर से पूछे जाने की ज़रूरत है।
क्योंकि अब नाम में बहुत कुछ रखा है—
वादे की इज़्ज़त, झूठ की उम्र, भरोसे की क़ीमत और जनता की याददाश्त।
और सबसे मज़ेदार बात तो यह है कि—
"मेरा नाम बदल देना" कहने वाले से तो फिर भी उम्मीद रहती है कि वह कभी अपना नाम बदलवाएगा...
लेकिन जो बिना यह शर्त लगाए वादे करता है, उसका नाम जनता बदलती भी है तो उसे पता तक नहीं चलता।
तो मेरी सरकार से एक विनती है कि ऐसे भ्रामक दावे करने वाली कंपनियों के लिए यह अनिवार्य कर दिया जाए कि "जो उनके वादे पूरे न हों, तो भोली जनता अपने हिसाब से उनका नया नाम रख ले।"
बड़ी भगदड़ की स्थिति बन जाएगी!
ज़रा कल्पना कीजिए!
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