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प्रेम दया विश्वास से, विजयी हो संसार - दोहा छंद - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
प्रेम दया विश्वास से, विजयी हो संसार - दोहा छंद - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
मंगलवार, जून 30, 2026
प्रेम दया विश्वास से, सुंदर घर निर्माण।
कटु वाणी से टूटकर, बिखरे ख़ुशियाँ प्राण॥
बचपन की मुस्कान से, महके गली सुहात।
मिल-जुल कर जब लोग हों, मुस्काए जज़्बात॥
सत्य मार्ग पर जो चला, नहीं डरा आघात।
संघर्षों से नित लड़े, फँसा नहीं जज़्बात॥
अहंकार के वृक्ष से, अंतस हो कमज़ोर।
समझ गिरा वह लक्ष्य पथ, उपहासित चहुँओर॥
काँच हृदय मत तोड़िए, जुड़ता नहीं दरार।
कटु शब्दों की चोट से, मर जाता व्यवहार॥
संत समागम पुण्यमय, बहता निर्मल नेह।
यदि आँगन में संत हों, खिल उठता है गेह॥
न्याय जहाँ निर्भीक हो, जग में बढ़ता मान।
अन्यायी का शीघ्र ही, मिट जाता अभिमान॥
दायित्वों का भार जो, हँसकर सदा निभाय।
उसके जीवन चमन में, सुयश खु़ुशी मुस्काय॥
पीत पंख नभ छू रहे, डाली गाए राग।
नन्हा पंछी बाँटता, वन-उपवन अनुराग॥
हरित धरा की गोद में, बैठा सुख खग मीत।
मधुर चहक से जोड़ता, जीवन का संगीत॥
तजे सकल कटुता कलह, लोभ मोह मद क्रोध।
दया अहिंसा न्याय सच, मिटे क्षमा अवरोध॥
मीत रीति सद्नीति रस, बने चासनी प्रीत।
भींगे तन मन माधुरी, मीत गीत नवनीत॥
प्रेम दया विश्वास से, हो विजयी संसार।
शील धीर गुण कर्म ही, रिद्धि सिद्धि आधार॥
मानवीय संवेदना, करुणा चित्त अधीर।
पौरुषेय परहित विनत, हरे वेदना पीर॥
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