स्वाभिमान की अग्निपरीक्षा - कहानी - डॉ॰ पीताम्बरी

स्वाभिमान की अग्निपरीक्षा - कहानी - डॉ॰ पीताम्बरी | Hindi Kahani - Swabhiman Ki Agnipariksha - Dr Pitambari

कॉलेज के स्टाफ रूम की वह दोपहर कुछ अलग थी। खिड़की से छनकर आती धूप वैदेही की मेज पर बिखरी कॉपियों पर सुनहरी लकीरें खींच रही थी। चारों ओर कुर्सियों के खिसकने, चाय की चुस्कियों और वेतन वृद्धि की चर्चाओं का शोर था, लेकिन वैदेही के लिए जैसे पूरा संसार उस एक लाल क़लम और छात्र की कॉपी में सिमट गया था। वह शब्दों की अशुद्धियों को नहीं, बल्कि उन शब्दों के पीछे छिपे विद्यार्थी के भविष्य को सुधार रही थी।

तभी, मेज के किनारे पर चाय का एक कप बहुत ही सलीके से रखा गया। वैदेही ने नज़रें उठाईं। सामने आदित्य खड़े थे—सादा कुर्ता, आँखों पर गंभीर चश्मा और चेहरे पर एक ऐसी सौम्यता जो किसी को भी ठहरकर बात करने पर मजबूर कर दे।

“वैदेही जी, मैं पिछले पंद्रह मिनट से देख रहा हूँ,” आदित्य की आवाज़ धीमी पर वजनदार थी, “स्टाफ रूम की इस गहमागहमी में आप किसी साध्वी की तरह अपनी कॉपियों में लीन हैं। क्या इन कोरे काग़ज़ों में आपको कोई खजाना मिल गया है?”

वैदेही ने हल्का सा मुस्कुराते हुए कलम मेज पर रखी। “खजाना तो नहीं आदित्य जी, पर हाँ, अपनी पहचान ज़रूर मिल गई है। मेरे लिए ये कॉपियाँ सिर्फ़ काग़ज़ नहीं हैं, ये उस संघर्ष का प्रमाण हैं जिसे यहाँ तक पहुँचाने के लिए मैंने अपनी चप्पलें तक घिस दी हैं।“

आदित्य ने पास वाली कुर्सी खींची और बैठते हुए बोले, “यही बात आपको दूसरों से अलग बनाती है। संघर्ष तो हर कोई करता है, पर उसे गरिमा के साथ ओढ़ लेना हर किसी के बस की बात नहीं। मैंने आपकी कहानियाँ पढ़ी हैं—उनमें शब्दों से ज़्यादा आपकी रूह बोलती है। अगर जीवन की राह पर ऐसा कोई साथी मिल जाए जो इन शब्दों के पीछे के छालों को पढ़ सके, तो सफ़र की थकान जैसे उत्सव बन जाती है।“

आदित्य के शब्दों में कोई बनावट नहीं थी, सिर्फ़ एक गहरा सम्मान था। वैदेही की धड़कनों ने उस दिन एक नई लय पकड़ी। उसे लगा, यह वह इंसान है जो उसकी सफलता से नहीं, बल्कि उसकी उस ‘फटी चप्पल’ वाली यात्रा से प्रेम करता है। उस दोपहर की चाय का स्वाद वैदेही के लिए बस चाय नहीं, बल्कि एक नए जीवन की आहट बन गया।

पर वह नहीं जानती थी कि घर की दहलीज़ पार करते ही, उसके इस मूक प्रेम और स्वाभिमान के सामने ‘समझौते’ की एक ऊँची दीवार खड़ी होने वाली है।

जब वैदेही छुट्टियों में घर पहुँची, तो हवा में कुछ भारीपन था। माँ रसोई में चुपचाप काम कर रही थीं और पिता आँगन में अखबार के पन्ने पलट रहे थे। जैसे ही वैदेही पास पहुँची, पिता ने एक अख़बार की कतरन और एक युवक की चमकीली तस्वीर मेज पर दे मारी।

“वैदेही, मैंने सब तय कर लिया है। लड़का बड़ा इंजीनियर है, खानदानी लोग हैं और शहर का सबसे आलीशान बंगला है उनका। कल तुझे उनसे मिलने जाना है।“ पिता के स्वर में कोई गुंजाइश नहीं थी, सिर्फ़ एक पत्थर की लकीर जैसा फ़ैसला था।

वैदेही ने काँपते हाथों से उस फ़ोटो को छुआ, पर उसकी आँखों के सामने आदित्य का वह सौम्य चेहरा आ गया। उसने साहस जुटाया और पहली बार पिता की आँखों में आँखें डालकर कहा, “पापा, मैंने आपसे आदित्य के बारे में बताया था। वे भी शिक्षक हैं, वे मेरी रूह को समझते हैं... मैं अपना जीवन उनके साथ बिताना चाहती हूँ।“ कहते हुए वैदेही ने आदित्य के बारे में पिता को सब कुछ कह डाला।

“क्या समझते हैं वो?” पिता का ग़ुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। “वही तंगहाली? वही अभाव? वैदेही, तूने पूरी ज़िंदगी फटी चप्पलों में काटी है, मैंने तुझे धूप में जलते देखा है। मैं अब और नहीं देख सकता कि मेरी बेटी फिर से एक कच्चे घर में जाकर चूल्हा फूँके। उस इंजीनियर का घर शहर का गौरव है, वह तुझे रानी बनाकर रखेगा।“

वैदेही की आँखों में आँसू थे, पर उसकी आवाज़ में वही ‘निराला’ वाला आक्रोश था जो उसने कॉलेज की पहली बेंच पर बैठकर सीखा था। “पापा, महलों में अक्सर रूहें क़ैद हो जाती हैं। मुझे रानी बनकर किसी के इशारों पर नहीं नाचना, मुझे एक आज़ाद इंसान बनकर जीना है। आपने मेरी ग़रीबी देखी है, पर मेरा वह स्वाभिमान नहीं देखा जिसने मुझे कभी बिकने नहीं दिया। आदित्य का घर मिट्टी का हो सकता है, पर वहाँ की नींव ‘सम्मान’ की है।“

लेकिन पिता ने अपनी ज़िद की दीवार ऊँची कर ली। उन्होंने वैदेही को उस इंजीनियर से मिलने के लिए मजबूर कर दिया, जहाँ उसके जीवन की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा होनी थी।

अगले दिन, शहर के सबसे महँगे रेस्टोरेंट की भारी काँच की दीवारों के पीछे वैदेही बैठी थी। चारों ओर मद्धम संगीत और कीमती परफ्यूम की ख़ुशबु तैर रही थी, लेकिन वैदेही को वहाँ का वातावरण दमघोंटू लग रहा था। सामने बैठा ‘इंजीनियर’ अपनी कलाई पर बंधी सोने की घड़ी को बार-बार ऐसे ठीक कर रहा था मानो वैदेही को अपनी क़ीमत बता रहा हो।

उसने वैदेही को एक नज़र देखा—नीचे से ऊपर तक—जैसे कोई व्यापारी किसी सामान की गुणवत्ता जाँचता है। फिर अपना फ़ोन मेज पर पटकते हुए बोला, “तो वैदेही, तुम्हारे पिता बता रहे थे कि तुम काफी ‘महत्वाकांक्षी’ हो। देखो, शादी के बाद ये सरकारी नौकरी और कॉलेज के चक्कर नहीं चलेंगे। एक क्लास-वन ऑफिसर की पत्नी को धूल भरे गलियारों में कॉपियाँ जाँचते हुए देखना मेरी प्रतिष्ठा के ख़िलाफ़ है।“

वैदेही ने एक गहरी साँस ली। उसका जी चाहा कि अभी उठकर चली जाए, पर वह चुप रही। उसे देखकर इंजीनियर को लगा कि वह दब गई है। वह और भी तल्ख़ होकर बोला, “और हाँ, एक बात और। सुना है तुम सालों तक बाहर अकेले कमरे में रही हो? आजकल की वर्किंग लड़कियों का कुछ भरोसा नहीं, अकेलेपन में किसके साथ क्या ताल्लुक़ात रहे हों, कौन जाने! मुझे एक ऐसी पत्नी चाहिए जिसका अतीत सफ़ेद पन्ने की तरह कोरा हो।“

वैदेही के भीतर जैसे सन्नाटा छा गया। वह सन्नाटा जो तूफ़ान के आने से पहले होता है। उसने मेज पर रखा पानी का गिलास उठाया, एक घूँट भरा और फिर गिलास को मेज पर इतनी सटीकता से रखा कि उसकी आवाज़ पूरे केबिन में गूँज उठी।

उसकी आवाज़ अब ठंडी और धारदार थी, “मेरे चरित्र का ‘सर्टिफिकेट’ देने की हैसियत आपकी नहीं है। जिन गलियारों और जिस अकेलेपन की आप बात कर रहे हैं, उसी ने मुझे स्वावलंबन सिखाया है। आपको पत्नी नहीं, एक ‘महँगी दासी’ चाहिए जो आपकी शान बढ़ाए और आपके अहंकार की पूजा करे। पर अफ़सोस, मैं एक ‘इंसान’ हूँ, कोई शो-पीस नहीं। आपके पास बंगला तो बहुत बड़ा है, पर आपकी सोच की छत बहुत नीची है।“

इंजीनियर कुछ बोल पाता, उससे पहले ही वैदेही अपनी कुर्सी छोड़कर खड़ी हो गई। “आपका यह रिश्ता आपके वैभव को मुबारक, मेरे स्वाभिमान को नहीं।“ वह बिना पीछे मुड़े बाहर निकल गई।

घर पहुँचकर वैदेही सीधे पिता के पास गई। उसके पैर आज भी उसी रफ़्तार में थे जैसे वह कॉलेज की पहली बेंच की ओर बढ़ती थी। उसने अपने हाथ में पकड़ा ‘नेट’ का सर्टिफिकेट और अपनी पहली सैलरी का वह लिफ़ाफ़ा, जो उसने सहेजकर रखा था, पिता के पैरों के पास मेज पर रख दिया।

“पापा, यह लिफ़ाफ़ा और यह काग़ज़ मेरी तीन साल की भूख, मेरी फटी चप्पलों के छाले और रातों की नींद का नतीज़ा है। यह मेरी पवित्रता का सबसे बड़ा गवाह है।“ वैदेही की आवाज़ भारी थी पर काँप नहीं रही थी।

उसने आँखों में आँसू भरकर कहा, “आज उस इंजीनियर ने मेरे चरित्र पर शक करके आपकी परवरिश को कटघरे में खड़ा किया है। अब आप फ़ैसला कीजिए—आपको समाज की झूठी शान प्यारी है या अपनी बेटी का सम्मान? अगर आज आपने मुझे उस सोने के पिंजरे में धकेला, तो समझ लीजिएगा कि आपने अपनी उस वैदेही को मार दिया जिसने आपकी इज़्ज़त के लिए ख़ुद को तपाया था।“

पिता अवाक रह गए। उन्होंने वैदेही के चेहरे पर वही अजेय चमक देखी जो उन्होंने तब देखी थी जब वह पहली बार गोल्ड मेडल जीतकर आई थी। उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ। उन्होंने काँपते हाथों से वैदेही का सिर चूमा और धीमी आवाज़ में कहा, “मुझे माफ़ कर दे लाडो। मैं ईंट-पत्थरों की चमक में इतना अंधा हो गया था कि अपनी बेटी के संकल्प का नूर नहीं देख पाया। जा, जहाँ तेरा सम्मान है, वहीं तेरा घर होगा।“

वैदेही और आदित्य की शादी किसी होटल या मैरिज गार्डन में नहीं, बल्कि उसी छोटे से घर के आँगन में हुई। कोई शोर-शराबा नहीं था, कोई बड़ा दहेज नहीं—बस मंत्रों की गूँज थी और दो ऐसे लोगों का साथ था जो एक-दूसरे की रूह की क़द्र करते थे।

विवाह के बाद जब वैदेही ने अपने नए घर में क़दम रखा, तो आदित्य ने उसे एक छोटा-सा उपहार दिया। वैदेही ने खोला तो अंदर ‘हवाई चप्पलें’ नहीं, बल्कि मखमली जूतियाँ थीं।

आदित्य ने धीरे से कहा, “इनमें चलते हुए कभी ‘चट-चट’ की आवाज़ नहीं आएगी वैदेही, क्योंकि अब तुम्हारे संघर्ष के शोर को दुनिया की नज़रों से छिपाने की ज़रूरत नहीं है। अब तुम्हारी लेखनी और तुम्हारी सादगी ही तुम्हारी पहचान है।“

आज वैदेही एक सफल लेखिका और प्रोफेसर है। वह जब भी किसी कॉलेज में लेक्चर देने जाती है, तो अपनी कार की डिग्गी में उन ‘पुरानी फटी चप्पलों’ को ज़रूर रखती है। वे चप्पलें उसे याद दिलाती हैं कि ऊँची उड़ान भरने के लिए पंख भले ही नए हों, पर हौसला उन्हीं पुरानी चोटों से आता है। 


डॉ॰ पीताम्बरी - ब्यावर (राजस्थान)


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