साहित्य - दोहा छंद - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज' | साहित्य पर दोहे
सोमवार, जनवरी 12, 2026
साहित्य मन का दीप है, तम को करता दूर।
अक्षर-अक्षर में बसे, जीवन के दस्तूर॥
पीड़ा की भाषा बने, आँसू का अनुवाद।
साहित्य दर्पण जगत, जागे मानववाद॥
नहीं सजावट शब्द की, धोखा छल औचित्य।
सच की सादी धूप में, सदैव खिले साहित्य॥
जो निर्बल की वेदना, बन जाए अभिव्यक्ति।
वही लेखनी पूज्य है, वही सच्ची शक्ति॥
काल-प्रवाह में बह रही, थामे सुमति विवेक।
साहित्य सेतु जीवन जगत, जोड़ें युगों अनेक॥
सद्विचार बाज़ार में, रूप धरे व्यापार।
संस्कार साहित्य में, रचे सत्य आधार॥
शब्द नहीं केवल रहे, चेतन का विस्तार।
रीति नीति साहित्य ही, दे जीवन आकार॥
मनुज बने मानव चरित, कुटिल द्वेष छल भूल।
साहित्यिक सार्थक नज़र, मानवता अनुकूल॥
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