आरक्षण - कविता - डॉ॰ अबू होरैरा

एक दर्द यह भी,
नहीं कोई हमदर्द भी।
मैं जुम्मन 'अंसारी'
वह सुरेश 'कोरी'
दोनों एक दूसरे के दलित पड़ोसी।
दोनों का पेशा एक,
व्यवहार एक,
और दोनों ही जुलाहे।
दो महिलाएँ!
दोनों ही सफ़ाई कर्मचारी।
दोनों के काम में भी बराबरी।
दोनों में मित्रता भी ख़ूब।
एक हलालखोर
और दूसरी भंगी।
एक मान्यता प्राप्त दलित
और दूसरी अमान्य दलित।
पंचर बनाने वाला अब्दुल
और चप्पल बनाने वाला संतोष
एक व्यवस्था में
दूसरा दुरावस्था में
इसी भांति अनेकों जातियाँ
इनमें कोई भेद नहीं
अतिरिक्त इसके
एक अल्लाह का बंदा
दूसरा ईश्वर का भक्त
किन्तु व्यवस्था का भेद
और हमारा खेद
एक सरकारी सेवा में
दूसरा यथा सेवा में
प्रश्न तो बनता है
सत्ता से, क़ानून से
बुद्धिजीवियों से
और तथाकथित सेक्युलरों से भी
ये अंतर कैसा?
ये मंत्र कैसा?
और ये तंत्र कैसा?
जहाँ धर्म के आधार पर भेद भाव?

डॉ॰ अबू होरैरा - हैदराबाद (तेलंगाना)

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