देख सजनी देख ऊपर - गीत - गिरेन्द्र सिंह भदौरिया 'प्राण'

देख सजनी देख ऊपर।
इंजनों सी दड़दड़ाती, बम सरीखी गड़गड़ाती।
रेल जैसी धड़धड़ाती, फुलझड़ी सी तड़तड़ाती॥
पल्लवों को खड़खड़ाती,
पंछियों को फड़फड़ाती।
पड़पड़ाती पापड़ों सी,
बोलती है कड़कड़ाती॥
भागती तो भड़भड़ाती, बावरी सी बड़बड़ाती,
हड़बड़ाती, जड़बड़ाती, सरसराती थरथराती।
आ रही है मेघमाला।
देख सजनी देख ऊपर॥ और ऊपर और ऊपर॥
आ रही है मेघमाला॥

वह पुरन्दर की परी सी घेर अम्बर और अन्दर,
और अन्दर कर चुकी है श्यामसुन्दर से स्वयंवर।
रिक्ष बन्दर सी कलन्दर खा चुकन्दर बन मुछन्दर,
हो धुरन्धर सींच अंजर और पंजर बाग़ बंजर॥
कर समुन्दर को दिगम्बर फिर बवण्डरसा उठाती, 
बन्द बिरहिन का कलेजा खोल ख़ंजर सा चलाती।
आ रही है मेघमाला।
देख सजनी देख ऊपर॥ और ऊपर और ऊपर॥
आ रही है मेघमाला॥

भामिनीसी कामिनी सहगामिनी मृदुयामिनी सी,
वामिनी गजगामिनी ले दामिनी मनस्वामिनी सी।
रागिनी घनवादिनी पंचाननी सौभागिनी सी,
जामुनी हंसासनी सी सावनी मधु चासनी सी॥
जीवनी में घोलती संजीवनी सा रस बहाती,
तरजनी सी मटकनी कुछ कटखनी बातें बनाती।
आ रही है मेघमाला।
देख सजनी देख ऊपर॥ और ऊपर और ऊपर॥
आ रही है मेघमाला॥
देख सजनी देख ऊपर॥

गिरेंद्र सिंह भदौरिया 'प्राण' - इन्दौर (मध्यप्रदेश)

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