क्या यही था, दोष मेरा? - कविता - सौरभ तिवारी 'सरस्'

निष्कामना की प्रीति हिय में धार कर,
और विषमताओं के बंधन पार कर,
प्रिय तेरी मुस्कान था परितोष मेरा,
क्या यही था, दोष मेरा?

इक कहानी जिसमें तुम रानी रहीं,
प्यास मैं, तुम उर्वि-तल पानी रहीं,
तुम बहो कलकल, सदा झर-झर रहो,
मंद मैं करता रहा, उदघोष मेरा,
क्या यही था, दोष मेरा?

नेह निधि, बस एक मेरी सम्पदा,
चाहता प्रिय बारना, तुम पर सदा,
तुमको ना जाने विरक्ति, क्युँ हुई?
था बहुत बाक़ी अभी तो कोष मेरा,
क्या यही था, दोष मेरा?

मौन मन के भाष्य को समझा नहीं,
हास्य में नैरास्य को, समझा नहीं,
अभियोजनों में, साक्ष्य सब निर्मूल थे,
सत्य मैंने कर लिया, ख़ामोश मेरा,
क्या यही था, दोष मेरा?

सौरभ तिवारी 'सरस्' - करैरा, शिवपुरी (मध्यप्रदेश)

Instagram पर जुड़ें



साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिए साहित्य से जुड़ी Videos