महँगी मिशाल - कविता - महेश कुमार हरियाणवी

सुर में ना ताल है,
वन में ना छाल है।
गैस नहीं जल रही,
बिगड़ा-सा हाल है।

पिचक गए गाल है,
दिखते कंकाल है।
जल सारा जल गया,
ग़लती ना दाल है।

पथ पे ना चाल है,
उखड़ी-सी खाल है।
धन को कमाके धन
खाली कंगाल हैं।

सपनों में थाल है,
मकड़ी का जाल है।
टिकता नहीं है कुछ,
घूमता सवाल है।

महँगा कमाल है,
चोट में उछाल है।
वक़्त को निगल रही,
रेत की मिशाल है।

निर्धन कंगाल है,
गल में भूचाल है।
कुर्सी पे बैठ बना,
धन मालामाल हैं।

सुर में ना ताल है,
वन में ना छाल है,
गैस नहीं जल रही
बिगड़ा-सा हाल है।

महेश कुमार हरियाणवी - महेंद्रगढ़ (हरियाणा)

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