शशिधर बम बम - घनाक्षरी छंद - रविंद्र दुबे 'बाबु'

तिलक विजय सज
गंग लट जट सट।
हर हर सब पर
बम बम बम बम॥

कंठ पर विषधर
विष पिय जमकर।
बम बम बम बम
हर हर बम बम॥

सरपट करतल 
अपपठ फट कर।
उग्र भव शशिधर
दव नर बमबम॥

वृक्ष, अन, जल सब 
रुद दुख हर वर।
समपति जलचर 
विचलन भम भम॥

धनुष पिनक धर
त्रिफल सबल कर।
डमर समर रन 
बज डम डमडम॥

तिनयन हिमधर 
शंकर अभय दव।
अजगव भयकर 
नभ थल मममम॥

सकल जगत मन
हरश करत जन।
मचल उठत मन
नच धम धमधम॥

भस्म असुर तब 
नटखट नंद बल।
सुत कट गज बन 
खलबल बमबम॥

मुंड सज दक्ष घर 
भसम रगड़ तन।
गरज़ गगन भर 
गिरि पथ बम बम॥

पहल करत तब 
विनय करत सब।
समर मगन नच 
करधन झम झम॥

सफल सबल पल 
हरश नयन फल।
सकल करत जय 
हर हर बम बम॥

श्रवण दिवस जब 
जपत करत सब।
हरशित जनमन
बम बम बम बम॥

रविन्द्र दुबे 'बाबु' - कोरबा (छत्तीसगढ़)

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