हांँ भारत की नारी है वो - कविता - राघवेंद्र सिंह

कहीं चांँदनी सी है चंचल,
कहीं दामिनी सा उद्घोष।
कहीं करुण सी है तरुणाई,
कहीं ज्वाल सा दिखा रोष।

फूल नहीं चिंगारी है वो,
हांँ भारत की नारी है वो।

कहीं प्रेम की वो है मीरा,
रणभूमि की लक्ष्मीबाई।
स्वाभिमान की कहीं पद्मिनी,
कहीं बनी वो जोधाबाई।

गंगा धार सी तारी है वो,
हांँ भारत की नारी है वो।

कहीं कृष्ण की बनी राधिका,
कहीं द्रौपदी सी असहाय।
कहीं है सीता सी वह कोमल,
कहीं बनी वह पन्ना धाय।

जग की सच्ची अधिकारी है वो,
हांँ भारत की नारी है वो।

नित है जाग्रत नहीं सुषुप्त,
सदा समर्पण का है भाव।
बाहर से वह रहती हंँसमुख,
दिल के अंदर दुःख के घाव।

किंतु जगत पर भारी है वो,
हांँ भारत की नारी है वो।

राघवेंद्र सिंह - लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

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