श्रम की अद्भुत मिसाल किसान - कविता - अर्चना कोहली

श्रम की अद्भुत मिसाल किसान कहलाते हैं,
निर्धन-धनी सभी की क्षुधा शांत करते है।
जी-तोड़ मेहनत कर ख़ुशहाली धरा पर लाते,
फिर भी अधिकतर ही अधपेट वे रह जाते।।

ग्रीष्म में जब दिनकर अनल-सा जलाता है,
गर्म हवाओं से जिया हमारा घबरा जाता है।
तब भी खेत-खलिहानों में हलधर काम करते,
निज स्वेद-बूँदों से धरा-अभिषेक करते रहते।।

शरद में पाले-मार से ठिठुरन बढ़ती ही जाती,
अंबर से जब ओलों की जमकर बरसात होती।
कोहरे से दिन में भी यामिनी का आभास होता,
तब भी किसान भू के प्रति अपना कर्तव्य निभाता।।

संघर्षों की भट्ठी में जलकर कुंदन हलधर बनते,
मिट्टी से अन्न रूपी सोना उपजा धरा-पुत्र कहलाते।
उत्तम पैदावार की ख़ातिर लाख यतन करते,
धरा को हरियाली वसन पहनाकर ही दम लेते।।

प्रकृति-प्रकोप भी तो इन्हीं के हिस्से में आता,
कभी अनावृष्टि तो कभी अतिवृष्टि वह झेलता।
बरखा का सीधा असर उनके जीवन पर पड़ता
ख़ुशी हो या ग़म सब बरखा पर ही निर्भर होता।।

किसान ही देश-ख़ुशहाली के राज़ होते हैं,
देश-तरक्की के वही सच्चे कर्णधार होते हैं।
श्रम की महत्ता को उनकी कम न कभी समझना,
निस्वार्थ भाव से सदैव उनके काम आते रहना।।

अर्चना कोहली - नोएडा (उत्तर प्रदेश)

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