देखो ये भूखा प्यासा - कविता - अंकुर सिंह

देखो ये भूखा प्यासा, 
घर परिवार छोड़ चला।
दो पल की रोटी ख़ातिर,
अपनों से मुँह मोड़ चला।।

उदर में जब उठती ज्वाला,
खा रोटी होता मतवाला।
कल का क्या होगा सोच,
कहता छोड़ो है ऊपरवाला।।

देखो ये भूखा प्यासा...

अपने रक्त को श्रमकण बनाता,
श्रम की रोटी सकून से खाता।
अपनी धधकी उदर ज्वाला को,
रूखी सूखी खिला शांत कराता।।

वृद्ध बाप, अबोध बाल्य छोड़,
चला आया ये परदेश कमाने।
भूल इन्हें करता मेहनत से काम,
ताकि परिजन को मिले आराम।।

देखो ये भूखा प्यासा...

परदेश बड़ा अजब रंग दिखाता,
बिन स्वजन इसका मन न भाता।
तिरिया के ख़ुशियों के ख़ातिर,
सुख-दुख सह परदेश में रहता।।

एक तारीख़ को पगार पाते,
प्रफुल्लित मन इसके खिलते।
सभी ख़ातिर घर भेज पैसे,
फिर ये रह लेता भूखे प्यासे।।

देखो ये भूखा प्यासा...

अंकुर सिंह - चंदवक, जौनपुर (उत्तर प्रदेश)

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