दुःख - कविता - रमेश चंद्र वाजपेयी

दुःख तेरा एहसान है कि
सुख का एहसास करा देता है, 
व्यथा ही एक ऐसी विधा है,
जो ईश्वर को याद दिला देता है।
अगर विपत्ति न हो तो
अपनों की पहचान कैसे हो,
वेदना में संवेदना ही हमें भी 
अहसास कराती है
तुम्हें जैसे समझते थे वैसे हो।
ऐसा अवसाद जब पुत्र या सगे संबधी
बिछुड़ जाते हैं, 
यह ग़म जो धंधे में घाटा खाए
और मुँह से छूटे
कटु वचन सूल बन जाते हैं।
दोस्तो वैमनष्यता
ही तो जीवन की
टीस की खाई गहरी 
कर देती है, 
विपत्ति जीवन में आए जाए
वह सयंम का
सबक सिखा देती है।
वेदना चाहे 
शारीरिक हो या प्रति स्पर्धा की
अपने पराए का
आभास करा देता है, 
दुःख तेरा एहसान है
की सुख का एहसास 
करा देता है।
ब्रज की सखियाँ
असीम वेदना सह
लेती हैं
किंतु कृष्ण प्रेम
नहीं छूटा 
यही तो प्रेम 
की पराकाष्ठा होती है।
अडिग रहा ध्रुव,
का प्रेम
चाहे कितना भी सन्ताप
सहा
होलिका जल ही जाती है।
किसान के पास 
कुछ न हो तो भी
अपनी व्यथा 
हँस कर सह लेता है।
विद्या अध्ययन करने वाला,
कंटक कष्ट आए आपार
फिर भी हँस लेता है।
वहीं जग का
श्रेष्ठ सितारा बन जाता है।
जो मानव त्रास को
अन-देखा कर,
वाह आगे बढ जाता है
जीवन की सच्चाई
यही है,
दुःख और सुख आते जाते ही,
जो शाम के बाद
सुबह का आभास करा देता है।
दुःख का एहसान है कि
सुख का एहसास करा देता है।

रमेश चंद्र वाजपेयी - करैरा, शिवपुरी (मध्य प्रदेश)

Instagram पर जुड़ें



साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिए साहित्य से जुड़ी Videos