दिव्यांगजन - कविता - नंदिनी लहेजा

तुम जैसे ही हम इंसान हैं,
अधूरे हुए तो क्या?
हृदय भरा हर भावना से तुम्हारी ही तरह,
तन के किसी हिस्से का साथ छूटा तो क्या?
कोई कहे हमको है अपाहिज,
कोई कहे दिव्यांगजन हमें,
कोई दिखाता दया करुणा हम पर
तो किसी की कटाक्ष सहते हैं हम।
हम में से कोई जन्म से अधूरा
तो कोई दुर्घटना का हुआ शिकार,
पर ईश्वर ने दिया है हमको जीवन
सदा हैं हम उनके शुक्रगुज़ार।
बस इक विनती करते आप सब से,
हमें भी स्वयं जैसे समझें,
न दिखाए हम पर केवल दया,
हमें भी कार्य-सक्षम समझे।
माना बिन साथ आपके
हमको कठिनाई होगी,
हम तो सदा से चाहते 
आप मित्रों का साथ,
परन्तु बिना किसी सहानुभूति।
स्वाभिमान संग जीवन जीने का अधिकार,
बोझ न समझे कोई हमें
आत्मनिर्भर बनने के हों हक़दार।

नंदिनी लहेजा - रायपुर (छत्तीसगढ़)

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