फूलों की डगर में पत्थर बरसते हैं - कविता - दिनेश कुमार मिश्र "विकल"

पत्थरों के शहर में पत्थर बरसते हैं।
फूलों की डगर में सुगंधी  महकते हैं।

जिंदगी के सफर में हमराही मिलते हैं।
उनसे ही डगर में पत्थर फूल बनते हैं।

पक्षियों की चहचहाहट में मधुरता है ।
उनसे ही तो सारा उपवन चकहता है।

सुदृढ़ समाज निर्मित करना चाहते हैं।
संस्कारों को सुदृढ़ बनाना चाहते हैं। 

स्वच्छता का ख्याल रखना चाहते हैं।
स्वास्थ्य भी स्वस्थ रखना चाहते हैं ।

'विकल' जिंदगी को चलाना चाहते हैं।
'दिनेश' अब  कुछ नया करना चाहते हैं।।

दिनेश कुमार मिश्र "विकल" - अमृतपुर , एटा (उ०प्र०)

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