चाहत मेरी रूह की - कविता - राजू शर्मा

वह कौन थी रूप की सहजादी, 
जिनके हिजाब में कायनात छुपी थी।
मेरी भी इच्छा थी दीदार करने की,
लेकिन न जाने वह किस ख्वाब में डूबी थी।

उनकी भी रूह मचलती थी दीदार करने को
लेकिन न जाने वह किस कश्मकश में फंसी थी।

वह कौन थी रूप की मलिका,
जिनके बुराख में प्यार का समंदर छुपा था।
मेरी भी तमन्ना थी उसी समंदर में डूब जाने की,
लेकिन न जाने वह क्यों मुझे दर  - किनार कर देती थी।

उनकी भी नशीली आंखो में शराब का पैमाना था
जिसे पाने के लिए मै सुबह - शाम दीवाना था।

वह कौन थी रूप की रानी,
जिनके दिल में मेरे दिल की धड़कन छुपी थी।
मेरी भी लालसा थी दिल में धड़कने की 
लेकिन न जाने वह क्यों धड़कन से मना कर देती थी।

उनकी रूह की कसम मैंने अपना जिस्म जला दिया,
लेकिन वह नहीं आई मेरे मजार पर और वह मुझे थपकी से सुला दिया।

वह कौन थी जन्नत की हुर,
जिनकी हूर में छुपा था मेरी जिन्दगी का कोहिनूर।
मेरी भी चाहत थी जिंदगी में चांद की तरह चमकने की
लेकिन न जाने वह किस जोहरी का नगीना हो गया था

मेरा भी अरमान था जिंदगी साथ- साथ जीने का, 
लेकिन न जाने वह किस हम सफर की तलाश में बैठी थी।


राजू शर्मा - बेलसंड, सीतामढ़ी (बिहार)

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