सैयद इंतज़ार अहमद की शायरी


देह से दूरी है जरूरी,
देह से दूरी बना के रखिये,
वक़्त बदला है,
हालात बदल जाएं,मगर
दिलों के बीच की दूरी को 
न बनने दीजिये।
~~
Deh se doori,hai jaroori,
Deh se doori bana ke rakhiye,
Wqt badla hai,
Halat badal jayein,magar
Dilon ke bich ki doori ko 
Na ban ne dijiye..

बना के रोज़ नए अफ़साने,
तसल्ली देता रहा दिल को अपने,
ख्याल आया मुझको तब,
जब मैं बन गया खुद अफसाना ।
~~
Bana ke roz naye,afsane,
Tasalli deta raha,dil ko apne,
Khyal aaya mujhko tab,
Jab main ban gaya khud afsana...

आदमी चाहता क्या है,वक़्त देता उसे क्या है,
ये ना वो समझता है ,न कोई उसे समझाता है,
बस कोसता रहता है, वो अपनी किस्मत को,
नासमझ है,बस इतना ही उसे समझ आता है।
~~
Aadmi chahta kya hai,wqt deta use kya hai,
Ye na wo samajhta hai,aur na koi use samjhata hai,
Bas kosta rahta hai,wo apni kismat ko,
Nasamajh hai, bas itna hi use samjh aata hai...

सैयद इंतज़ार अहमद
बेलसंड, सीतामढ़ी (बिहार)

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