तुम्हें क्या कहा जाय? - लघुकथा - डॉ॰ राम प्रमोद मिश्र

तुम्हें क्या कहा जाय? - लघुकथा - डॉ॰ राम प्रमोद मिश्र | Hindi Kahani - Tumhen Kya Kaha Jaaye - Dr Ram Pramod Mishra
दीपू को लेकर स्कूल के लिए निकल ही रहा था कि पत्नी ने कहा—
‘दो-तीन रोटियाँ बची हैं रात की, लेते जाईए, रास्ते में गाय या कुत्ता मिले तो खिला दीजिएगा।‘ अख़बार के एक टुकड़े में लपेट कर पकड़ा दिया।
छ: वर्ष के बच्चों का स्कूल सात बजे सुबह खोलने की सोच न जाने किसकी थी? इतने छोटे बच्चों को सुबह ही नींद से जगा कर स्कूल के लिए तैयार करना किसी अपराध करने जैसा लगता था, ख़ास कर के सर्दियों में। मैंने एक कन्धे पर दीपू का स्कूल बैग टाँगा और लगभग घसीटते हुए उसे लेकर स्कूल के लिए निकल पड़ा। दूरी अधिक नहीं थी पर मुख्य सड़क को पार करना ही कठिन काम होता था। फिर एक गली से होते हुए जाना पड़ता था जो सर्दियों में अक्सर सूनी रहती थी।
गली के मोड़ पर पहुँचते ही दीपू बोल पड़ा— ‘पापा - पापा! देखिए, चबूतरे पर एक काला कुत्ता बैठा है, इसे ही रोटी खिला देते हैं।
मैंने कुत्ते को पुचकारा तो पूँछ हिलाता पास आ गया। दीपू ने जैसे ही रोटियाँ फेंकी, कुत्ते ने लपक ली और वापस चबूतरे पर जाकर खाने लगा। तभी पीछे से एक मैडम आईं, ब्रेड के कुछ टुकड़े निकाले और कुत्ते के सामने डाल दिए।
अब एक दो दिन के अन्तर पर ऐसा हमेशा होने लगा। मैडम भी ऐसा ही करतीं। शिष्टाचारवश दीपू उन्हें आँटी कहने लगा और जब भी मिलतीं, उन्हें नमस्ते करता। मैं तो बस मुस्कुरा देता, वह भी एक छोटी-सी मुस्कान के रूप में प्रति उत्तर दे देतीं। न जाने क्यों मुझे यह क्षण बड़ा सुखमय लगता था। वे अपने ऑफिस की बस इसी मोड़ से पकड़ती थीं, सो क़रीब रोज़ ही भेंट हो जाती थी। कभी मैं पहले पहुँचता कभी वो पहले से खड़ी मिलतीं। कुत्ते को लाभ ही लाभ, आनन्द ही आनन्द। दीपू ने उसका नाम भी रख दिया–कालू।
सर्दियाँ बढ़ गईं थीं। कभी धुन्ध, कभी कुहरा पर हम लोगों की यह भेंट होती ही रहती थी। ऐसी ही धुन्ध भरी सुबह मैं दीपू को लेकर तेज़ गति से स्कूल जा रहा था। कल ही उसका जन्मदिन बीता था। रात में देर से सोए तो सुबह देर से उठ पाए। दीपू कुछ केक के टुकड़े और पूड़ियाँ ले आया था कालू के लिए। जल्दी-जल्दी उसने सब कुछ चबूतरे पर उलट दिया, कालू तो तैयार बैठा ही था–बस टूट पड़ा खाने के लिए।
देर हो रही थी, सो मैंने दीपू को गोद में उठा लिया, बैग को कन्धे पर संभालते हुए लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ स्कूल की ओर लगभग दौड़ पड़ा। उधर मैडम भी आती दिखीं। गोद में लदे-लदे ही दीपू ने उन्हें नमस्ते की। मैं तेज़ गति से अभी सौ क़दम भी आगे न बढ़ पाया था कि दीपू तेज़ आवाज़ में चिल्ला उठा– ‘पापा-पापा देखिए! एक आदमी आँटी का बैग छीन रहा है, जल्दी चलिए उनके पास’, कहते हुए वह गोद से उतरने के लिए मचलने लगा। मैंने पीछे मुड़ कर देखा। सचमुच कोई बदमाश उनसे बैग छीनने में लगा था। मैडम ने इशारा कर मुझे अपनी ओर बुलाया। मैं उलझन में पड़ गया- क्या करूँ? अगर मैं इस घटना में फँसा तो दीपू को स्कूल के लिए और मुझे ऑफिस के लिए देर हो जाएगी। कहीं उस आदमी के पास कोई हथियार न हो? और अगर पुलिस आ गई तो और झंझट में फँस जाऊँगा। तभी दीपू चिल्लाया—शाबास कालू! शाबास!
मैंने देखा– कालू ने उस बदमाश को दौड़ा लिया और कुत्ते के ख़ौफ़ से वह आदमी बिना बैग छीने ही भाग खड़ा हुआ।
अगले दिन उसी मोड़ पर मैडम बस की प्रतीक्षा में खड़ी थीं। दीपू ने नमस्ते की तो बस हाथ हिला दिया और मेरी ओर घोर घृणा तथा गहरी उपेक्षा की नज़रों से देखा। तभी कालू पूँछ हिलाता हुआ मेरे पास आ गया कि शायद मैं कुछ खाने के लिए दूँ, पर आज मेरे पास कुछ न था। दीपू बोला– ”पापा! कालू खाने के लिए कुछ माँग रहा है। अपनी टिफ़िन में से एक पूड़ी निकाल कर दे दूँ?”
‘नहीं! कालू कुत्ता है, तुम्हारी क्लास का कोई साथी नहीं। कुत्तों से ज़्यादा मेल जोल ठीक नहीं। कभी काट ले या कभी चाट ले तो इंजेक्शन और दवाईयाँ लेनी पड़ जाएगी।‘
मेरी ऐसी प्रतिक्रिया मैडम की उपेक्षा और तिरस्कार भरी नज़रों के कारण थी या और कोई कारण था– मैं जान नहीं पाया। तभी मैडम ने बिस्किट का एक पैकेट निकाला और खोल कर कालू के सामने रख दिया। मैं झेंप-सा गया।
उधर कालू एक अजीब सी नज़रों से मुझे देख रहा था। मुझे ऐसा लगा मानो वह मुझसे कह रहा हो– “मुझे कुत्ता कह लो क्योंकि मैं तो हूँ ही कुत्ता। लेकिन ज़रा कल की घटना याद करो और बताओ कि तुम्हें क्या कहा जाए?”
मैं नज़रें झुकाए स्कूल की ओर बढ़ चला।

डॉ॰ राम प्रमोद मिश्र - जनपद मिर्ज़ापुर (उत्तर प्रदेश)

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