वज़ीर - घनाक्षरी छंद - महेश कुमार हरियाणवी
शनिवार, जुलाई 04, 2026
हार का ना डर कोई
जीत का ना वादा है,
दुनिया ही अपनी है
अपना इरादा है।
हाथ वही काँपते हैं
डर की लहर पे,
जिनको यकीन घर
उनका बुरादा है।
साहसी है तन मेरा
चीर दे कफ़न को,
लाल हूँ मैदान का जो
धारे भेष सादा है।
उसकी ज़ुबान कहे
मुझको उजेड़ देगी?
ख़्वाब देख सरकार
सिखतड़ प्यादा है।।
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