फिर भी - कविता - हेमन्त कुमार शर्मा
गुरुवार, जुलाई 02, 2026
बहुत भीड़ है,
फिर भी तपिश अकेलेपन की।
दूर आकाश में,
और निर्जन वन में,
कोई वैमनस्यों को लेकर,
साधक,
अपने को साधने चला।
वहाँ विवादों की भीड़ है,
फिर भी तपिश अकेलेपन की।
मूढ़ता का उपवन,
जटिलता सा सरल,
मस्तिष्क।
भरे पूरे विचारों से,
पर-
रिक्त है स्नेह से,
रिश्तों की भीड़ है,
फिर भी तपिश अकेलेपन की।
बारिश की बूँदे,
पत्ते पर थरथराती।
पीपल यूँ पुराना है,
बरगद में सिमट कर।
आहट है वर्षा की,
ग्रीष्म फिर भी जाता नहीं,
कठोर है,
देखता है आगे,
स्यात् श्वास धीमें हैं,
फिर भी...
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