ज़िंदगीनामा - कविता - अमृत 'शिवोहम्'

ज़िंदगीनामा - कविता - अमृत 'शिवोहम्' | Hindi Kavita - Zindaginama - Amrit Shivoham. ज़िन्दगी पर कविता
ज़िंदगी क्या है?
दिए की लौ का जलना?
या तेज़ हवा में लौ का डगमगाना?
या डगमगाती लौ को हथेलियों से बचाना?
या बचाते-बचाते हथेलियों का जल जाना?

दिए का तेल ख़त्म होना?
या उसके बाद भी बाती का कुछ कुछ सुलगते रहना?
या जलते-जलते बाती का राख हो जाना?
या राख होकर भी किसी की आँख का काजल बन जाना?

और फिर किसी का मिलना?
उस काजल को अपनी आँखों में लगाना?
आँखों का अचानक चमक उठना?
और उस चमक में किसी बुझे इश्क़ का फिर से सुलग उठना?

ज़िंदगी क्या है?
ख़ुद लौ-सा जलकर उजाला करना?
या उजाला करके भी दिए-सा मिट्टी में फेंक दिया जाना?
या मिट्टी में मिट्टी होकर भी राह में उजाला छोड़ जाना?

क्या तुम सच में जी रहे हो?
या किसी अधूरे ख़्वाब की लौ को
हथेली पर रखे हुए हो,
या उसे बुझने से बचाते-बचाते,
धीरे-धीरे ख़ुद धुआँ हो रहे हो...


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