ज़िंदगीनामा - कविता - अमृत 'शिवोहम्'
सोमवार, जून 29, 2026
ज़िंदगी क्या है?
दिए की लौ का जलना?
या तेज़ हवा में लौ का डगमगाना?
या डगमगाती लौ को हथेलियों से बचाना?
या बचाते-बचाते हथेलियों का जल जाना?
दिए का तेल ख़त्म होना?
या उसके बाद भी बाती का कुछ कुछ सुलगते रहना?
या जलते-जलते बाती का राख हो जाना?
या राख होकर भी किसी की आँख का काजल बन जाना?
और फिर किसी का मिलना?
उस काजल को अपनी आँखों में लगाना?
आँखों का अचानक चमक उठना?
और उस चमक में किसी बुझे इश्क़ का फिर से सुलग उठना?
ज़िंदगी क्या है?
ख़ुद लौ-सा जलकर उजाला करना?
या उजाला करके भी दिए-सा मिट्टी में फेंक दिया जाना?
या मिट्टी में मिट्टी होकर भी राह में उजाला छोड़ जाना?
क्या तुम सच में जी रहे हो?
या किसी अधूरे ख़्वाब की लौ को
हथेली पर रखे हुए हो,
या उसे बुझने से बचाते-बचाते,
धीरे-धीरे ख़ुद धुआँ हो रहे हो...
साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिए साहित्य से जुड़ी Videos
साहित्य रचना कोष में पढ़िएँ
विशेष रचनाएँ
सुप्रसिद्ध कवियों की देशभक्ति कविताएँ
अटल बिहारी वाजपेयी की देशभक्ति कविताएँ
फ़िराक़ गोरखपुरी के 30 मशहूर शेर
दुष्यंत कुमार की 10 चुनिंदा ग़ज़लें
कैफ़ी आज़मी के 10 बेहतरीन शेर
कबीर दास के 15 लोकप्रिय दोहे
भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? - भारतेंदु हरिश्चंद्र
पंच परमेश्वर - कहानी - प्रेमचंद
मिर्ज़ा ग़ालिब के 30 मशहूर शेर

