जितेन्द्र सिंह राणावत - आभाखेड़ी, भीलवाड़ा (राजस्थान)
रम्यग्राम - कविता - जितेन्द्र सिंह राणावत
रविवार, जून 28, 2026
हरित वसन में सजी मेदिनी,
प्राची का स्वर्णिम रूप अनोखा।
अमराई की सघन छाँव में,
मलय पवन का शीतल झोंका।
गुंजित हैं खग-वृंद डाल पर,
कलरव से नव भोर जगाते।
हलधर चले खेतो की ओर,
श्रम के पावन गीत सुनाते।
सरसी के निर्मल जल ऊपर,
कमल मुकुल का सहज विकास।
धूलि-धूसरित बालक टोली,
बिखराती निश्छल उल्लास।
गो-धूलि की सुरभित बेला,
घंटियों का स्वर गूँजे मद्धम।
ग्राम्य सौम्य का अनुपम मिलन,
यही सत्य और सुंदर संगम।
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