रम्यग्राम - कविता - जितेन्द्र सिंह राणावत

रम्यग्राम - कविता - जितेन्द्र सिंह राणावत | Hindi Kavita - Ramyagraam - Jitendra Singh Ranawat.
हरित वसन में सजी मेदिनी,
प्राची का स्वर्णिम रूप अनोखा।

अमराई की सघन छाँव में,
मलय पवन का शीतल झोंका।

गुंजित हैं खग-वृंद डाल पर,
कलरव से नव भोर जगाते।

हलधर चले खेतो की ओर,
श्रम के पावन गीत सुनाते।

सरसी के निर्मल जल ऊपर,
कमल मुकुल का सहज विकास।

धूलि-धूसरित बालक टोली,
बिखराती निश्छल उल्लास।

गो-धूलि की सुरभित बेला,
घंटियों का स्वर गूँजे मद्धम।

ग्राम्य सौम्य का अनुपम मिलन,
यही सत्य और सुंदर संगम।

जितेन्द्र सिंह राणावत - आभाखेड़ी, भीलवाड़ा (राजस्थान)

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