धूमिल की कविता में समकालीन जनवादी चेतना - शोधपत्र - प्रवीन 'पथिक'
रविवार, जून 28, 2026
सारांश: धूमिल की कविता उस आम आदमी की कविता है जो आज की राजनीति के केंद्र में हैं। कभी हाशिए पर रखे जाने वाले इस आम आदमी को संसद के लेकर सड़क तक जिस प्रकार धूमिल ने देखा शायद उसका पुनर्नवीकरण हम आज की राजनीति में देख रहे हैं। धूमिल की कविताओं में विरोध और आत्मसंघर्ष प्रमुख विषय है। उनकी कविताएँ सामाजिक व्यवस्था, राजनीति, भ्रष्टाचार और व्यक्तिगत संघर्षों के प्रति कवि के आक्रोश और विरोध को दर्शाती है। धूमिल अपनी कविताओं में आम आदमी की पीड़ा और निराशा को व्यक्त करते हुए, व्यवस्था के प्रति सवाल उठाते हैं और परिवर्तन की माँग करते हैं।
धूमिल समाज के इतने सन्निकट हैं कि सामाजिक चिंतन उनके काव्य की मुख्य धारा में शामिल हो जाता है। धूमिल ने पक्षपात से परे सामाजिक तथ्यों को ज्यों का त्यों प्रस्तुत करके यह सिद्ध कर दिया कि समाज से पृथकता काव्य की जीवंतता के लिए घातक है। काव्य वही है जो समाज का प्रत्यक्ष सहभागी बने। सामाजिक गतिविधियों पर नज़र रखें। सामाजिक घटनाओं से प्रेरणा ले और मानव मात्र के सामाजिक संबंधों का अवलोकन करें। धूमिल के काव्य में समाजगत भावाभिव्यक्ति अपनी संपूर्ण विविधता और यथार्थ के साथ उन वास्तविकताओं का परिचय कराती है, जिससे समाज में क्षेत्रवाद, भाषावाद, जातिवाद, भ्रष्टाचार, युवा तनाव, अपराध, धर्म और नैतिकता में पतन जैसी विषम समस्याएँ पोषित हो रही है। मानवीय संबंधों को विघटित करने वाला असंतुलन ही धूमिल के काव्य का अनिवार्य विषय है।
बीज शब्द: सामाजिक, राजनीति, भ्रष्टाचार, आक्रोश, संघर्ष, विरोध, आम आदमी, भाषा।
प्रस्तावना: धूमिल साठोत्तरी कविता के प्रतिनिधि कवियों में एक थे और सचमुच एक ही थे। धूमिल अल्पायु में ही दिवंदत हो जाने के बावजूद अपनी प्रखर प्रतिभा के कारण साठोत्तरी हिन्दी कविता के सबसे तेजस्वी कवि के रूप में स्वीकृत हैं। उनकी शुरुआत गीतों से हुई परन्तु सातवें दशक के ऐतिहासिक संदर्भ ने उनकी कविता को एक नया आयाम दिया। राजनीति समाज का एक ऐसा ज्वलंत मुद्दा है जिससे कतरा कर निकल पाना किसी भी साहित्यकार के लिए संभव नहीं हो पाया है क्योंकि राजनीतिक यथार्थता प्रत्येक कालखंड की चेतना में प्रदर्शित होती रही है। हिन्दी कविता भी इस राजनीतिक प्रभाव से मुक्त नहीं हो सकी है। भले ही यह कमोवेश रूप में प्रभावित रही हो। धूमिल के विरोध एवं संघर्ष को व्यापक संदर्भ में देखने पर हम पाते हैं कि धूमिल अपनी पूरी कविता में संघर्षरत हैं, परन्तु निराश नहीं। वे संसदीय राजनीति के भ्रष्ट स्वरूप के प्रति अपना ग़ुस्सा, अपना आक्रोश निकालते हैं तो इस आस्था के साथ कि जनता इसके भ्रष्ट स्वरूप को बदलने में तत्पर हो सकें। वास्तव में धूमिल का 'विरोध' नवनिर्माण के लिए किया जाने वाला संघर्ष है।
(अ) सामाजिक यथार्थ: धूमिल की कविता जिन शब्दों का सबसे अधिक इस्तेमाल हुआ है, वे शब्द हैं– जनतंत्र, संसद, जनता, आदमी, जंगल, भाषा, कविता। इन शब्दों का एकाधिक प्रयोग उनकी कविता की मानसिकता को प्रकट करता है। आज़ादी के बाद भारतीय जनतंत्र से बुद्धिजीवियों ने जो आशाएँ लगा रखी थीं, वे पूरी नहीं हुईं। देश के जननायक सत्ता और कुर्सी के जोड़-तोड़ में डूबे रहे। फ़ाइलों में योजनाऍं बनती रहीं। भाषण और भोज होते रहे। खोखले नारे लगाए जाते रहे और इन सबके कुचक्र में देश का मामूली आदमी पिसता रहा। इन कटुस्थितियों का बयान सन् साठ के बाद की हिन्दी कविताओं में बहुत हुआ है।
धूमिल साठ के बाद उभरी पीढ़ी के एक महत्वपूर्ण कवि हैं। उनकी कविता भारतीय जनतंत्र की इन स्थितियों का सीधा साक्षात्कार करती है। विरोध और संघर्ष के भाव बोध को अभिव्यंजित करने के लिए धूमिल की भाषा भी नया संधान करती है। राजनीतिक ढोंग, छल, पाखंड और उसकी मानव-विरोधी व्यवस्था पर धूमिल की कविता कड़ा प्रहार करती है। आजादी, संसद, जनतंत्र, और समाजवाद पर व्यंग्य करते चलना धूमिल की कविता की एक ख़ासियत है–
क्या आज़ादी सिर्फ़ तीन थके हुए रंगों का नाम है?
जिन्हें एक पहिया ढोता है
या इसका कोई ख़ास मतलब होता है?
दरअसल, अपने यहाँ जनतंत्र
एक ऐसा तमाशा है
जिसकी जान
मदारी की भाषा है।
– पटकथा
अशोक वाजपेयी ने धूमिल के विषय में जो टिप्पणी की है वह उल्लेखनीय है–
"धूमिल का काव्य-संसार अकवियों की तरह कल्पना-विलास से रचाया गया है। ऐसा संदर्भचयुत लोक नहीं है जिसकी हमारे रोज़मर्रा के जीने से संगति और जीवित प्रासंगिकता स्पष्ट न हो और जिसमें कोई गहरी पहचान या खोज तो न उभरती हो लेकिन कवि के आत्म-
प्रदर्शन और आत्मस्फीति के लिए अवकाश ख़ूब हो।"
धूमिल ने कविता को समकालीन संदर्भ में पुनः परिभाषित किया। वे कहते हैं कि कविता घेराव में किसी बौखलाए हुए आदमी का संक्षिप्त एकालाप है। धूमिल की कविता सहजता की कविता है। उनकी कविता एक सहज जीवन जीने की प्रेरणा देती है। वे जो अनुभव करना चाहते हैं वही देखना भी चाहते हैं–
मैं चाहता हूॅं, मैं वह सब कुछ
अनुभव करूँ जो कुछ देखता हूॅं।
मैं साहस नहीं चाहता
मैं सहज होना चाहता हूॅं
ताकि आम को आम
और चाकू को चाकू कह सकूॅं।
— मैं सहज होना चाहता हूॅं।
धूमिल चाकू पर बराबर इसीलिए ताव देते हैं, कुछ अतिरिक्त भी और उस अतिरेक के ही कारण संप्रेषण की समस्या भी कहीं-कहीं खड़ी हो जाती है। वह आक्रोश मात्र परिस्थितिवश आक्रोश नहीं अपितु एक आम आदमी की यथार्थ अतःपीड़ा है।
(ब) मोहभंग का दौर: आज़ादी के बाद जिन लोगों ने देश की सत्ता सम्भाली थी, उनके भाषणों और वक्तव्यों में आदर्शवादी आह्वान रहता था। इसके विपरीत उनके आचरण में भोगवादी प्रवृत्तियाॅं हावी थीं। जनता ने इस दोहरे चरित्र को देखा। अकवितवादियों की रचनाओं में इसी दोहरे चरित्र की नग्न अभिव्यक्ति है। अकविता में इस स्थिति का भावनात्मक विस्फोट प्रकट हुआ है। यह भावनात्मक विस्फोट नकारवादी और अराजक प्रवृत्तियों का पोषक बना। 'धूमिल की अंतिम कवित' शीर्षक कविता में धूमिल कहते हैं–
क्या तुमने सुना यह
लोहे की आवाज़ है या
मिट्टी में गिरे ख़ून का रंग
लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
उस घोड़े से पूछो
जिसके मुॅंह में लगाम है।
— धूमिल की अंतिम कविता
धूमिल के काव्य में बदलते समय का आक्रोश भी है, जनतंत्र की नग्नता और रुग्णता के प्रति क्रोध भी है, आस्था और विश्वास की इच्छा भी है और टूटने की पीड़ा भी है। धूमिल के प्रभाव में आकर मोहभंग की अभिव्यक्ति अनेक कवियों ने की। सन् १९६५ के पश्चात् सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ के प्रस्तुतीकरण में परिवर्तन आया। धूमिल के आगमन के पश्चात् कविता का मुहावरा लगभग बदलता नज़र आया। न केवल कविता के मुहावरे की बल्कि कविता के नए व्याकरण की रचना भी धूमिल ने की।
मगर मैं जानता हूॅं कि मेरे देश का समाजवाद
मालगोदम में लटकती हुई
उन बाल्टियों की तरह है जिस पर 'आग' लिखा है
और उनमें बालू और पानी भरा है।
– पटकथा
वस्तुतः द्रष्टव्य है कि खीज, आक्रोश, बेचैनी, क्रोध, समाज का नग्न यथार्थ, हथियार के रूप भाषा का इस्तेमाल, उपेक्षितों, तिरस्कृतों की बेचैनी आदि इस युग की कविता के केंद्र में नज़र आते हैं।
(स) समकालीन कवियों पर धूमिल का प्रभाव: समकालीन कवियों पर धूमिल का प्रभाव दो रूपों में अभिव्यक्त हुआ है– पहला व्यवस्था के प्रति विद्रोह एवं आक्रोश के संदर्भ में, और दूसरा कोमल और मधुर भावों की अभिव्यंजना के संदर्भ में। समकालीन कवियों ने अपनी कविताओं में धूमिल के काव्य की व्यवस्था-विरोध की प्रवृत्ति के विकास के साथ-साथ एक समानांतर काव्य-संसार का भी सृजन किया।
धूमिल साधारण कवियों के पास मात्र दया और करुणा लेकर नहीं उपस्थित होते बल्कि उनके रोज़मर्रा के संघर्ष का साक्षी बनते हुए उनकी विचार दृष्टि एवं बुनियादी लोगों के प्रति उनकी भावात्मक क्रिया-प्रतिक्रिया को भी अंकित करते हैं। 'मोचीराम' कविता में मोचीराम के बड़प्पन को और उसके जीवन को ऑंकने वाली सूक्ष्म दृष्टि को उसकी शब्दावली में अंकित करते हुए वे कहते हैं–
बाबूजी जी! सच कहूँ– मेरी निगाह में
न कोई छोटा है
न कोई बड़ा है
मेरे लिए, हर आदमी एक जोड़ी जूता है
जो मेरे सामने
मरम्मत के लिए खड़ा है।
— मोचीराम
मोचीराम अलग-अलग आदमियों की नियति एवं प्रकृति का ख़ुलासा करता है, जो आज की भाग-दौड़ और अहंकार को बिंबित करता है। धूमिल इस कविता के माध्यम से हर स्थिति और परिस्थिति में एक अदद आदमी की शख़्सियत और स्वाभिमान को तलाशने की चेष्टा करते हैं। धूमिल की कविताओं में भूख एवं दरिद्रता की प्रतिछवियाँ पाठक के मन में करुण रस का संचार नहीं करतीं बल्कि ऐसी आर्थिक व्यवस्था का विरोध करने को तत्पर करती है जिसमें जनता का एक बड़ा भाग भूख एवं दरिद्रता का शिकार है। धूमिल केवल भूख एवं पीड़ा को उभारकर नहीं रह जाते बल्कि उस तंत्र की पहचान करते हैं और उसके विरोध में खड़े होने के लिए प्रेरित करते हैं–
आज मैं तुम्हें वह सत्य बतलाता हूॅं
जिसके आगे हर सच्चाई
छोटी है। इस दुनिया में
भूखे आदमी का सबसे बड़ा तर्क
रोटी है।
निःसंदेह इस दौर की कविताओं में धूमिल अपने विरोध एवं संघर्ष को एक चरम परिणति पर ले जाते हैं। उनकी कविताऍं आग और गोली की भाषा बोलने लगती है। उनका विरोध एवं संघर्ष अपने रास्ते में आने वाली सारी रुकावटों को नेस्तनाबूद करने को तत्पर हो उठता है।
(द) यथास्थितिवादी समाज व्यवस्था का विरोध: धूमिल का विरोध एवं संघर्ष व्याख्यायित करते समय प्रायः आलोचकों ने राजनीतिक व्यवस्था एवं आर्थिक तंत्र के विरोध को मुख्य रूप से उजागर किया है। इस प्रक्रम में उनके विरोध एवं संघर्ष के अन्य रूप कम उजागर हो पाए हैं। ये रूप धूमिल के अंतर्संघर्ष से जुड़े हुए हैं। धूमिल बाहर की दुनिया में जनतंत्र एवं अर्थतंत्र से तो टकराते ही हैं, अपने भीतर की दुनिया में अपने आप एवं अपने परिवेश से भी टकराते हैं। धूमिल सिर्फ़ व्यवस्था-निषेध मात्र की के कवि नहीं हैं। उनकी कविता संघर्ष की कविता है। उन्होंने कविता को धारदार हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है। अतएव उनकी कविताओं में आम जनता की यथास्थितिवादी मनोवृत्ति का भी विरोध दिखाई देता है। धूमिल की कविताओं में जनता की यथास्थितिवादी मनोवृत्ति के प्रति व्यंग्य का भाव वास्तव में विरोध का ही स्वर है। वे जानते हैं कि इस स्थिति के कारण गाॅंवों की बदहाली बरकरार है–
मेरे गाॅंव में
वही आलस्य, वही ऊब
वही कलह, वही तटस्थता
हर जगह हर रोज़
कोई किसी से कुछ नहीं पूछता
हर आदमी चुपचाप
जो कुछ करता है, समय करता है।
मेरे गाॅंव में हर रोज ऐसा ही होता है
— ऐसा ही होता है
धूमिल की कविता विरोध की कविता है। उनके अनुसार "इस वक्त सच्चाई का जानना/विरोध में होना है।" धूमिल पूर्वी उत्तरप्रदेश के जिन गाॅंवों के रहने वाले हैं, वहाॅं की जनता के चरित्र को उन्होंने बड़ी गहराई से पहचाना है। यह वह जनता है जो अपनी जरूरतों के आगे असहाय है। धूमिल की कविता मनुष्य के केन्द्रीय प्रश्नों से जुड़ी हुई कविता है जिसमें रोटी और भूख, शहर और गाॅंव, जनतंत्र व समाजवाद, संसद और सड़क प्रमुख हैं। यह प्रतिबद्ध, प्रगतिशील और संघर्षशील चेतना की कविता है। उसका संसार ठोस और जीवित प्रासंगिक संसार है।
निष्कर्ष: समकालीन कविता मूलतः मोहभंग की कविता है। धूमिल इसके प्रतिनिधि कवि हैं। उनकी कविताओं में व्यवस्था के प्रति आक्रोश और विद्रोह का भाव है। यह भाव एक तरफ़ आम जन की पीड़ा को 'जनवादी स्वर' प्रदान करता है, तो दूसरी तरफ़ यह आक्रोश, वितृष्णा, जुगुप्सा, और अश्लीलता के रूप अभिव्यक्त होता है। धूमिल के काव्य के इन दोनों पक्षों का प्रभाव समकालीन कविता के कवियों पर पड़ा। सृजन संदर्भों के अंतर्गत धूमिल की रचना धर्मिता ने अपनी संवेदनशीलता और अनुभूति को समकालीन संदर्भों को बख़ूबी उजागर किया है। धूमिल की सामाजिक चेतना, परिवेश की पीड़ा, संवेदना तथा छुए-अनछुए पहलुओं को समान रूप से छूती है। एक ओर सामाजिक समस्याओं के पहाड़ हैं तो दूसरी ओर समाधान रूपी सरिता। कविता में व्यवस्था विरोध के नए मुहावरे और व्याकरण गढ़ने की प्रेरणा, समकालीन कवि मुक्तिबोध, नागार्जुन, से होते हुए धूमिल से ही ग्रहण करते हैं। अतः समकालीन कविता को समकालीन बनाने में धूमिल के प्रभाव का महत्पूर्ण योगदान है।
संदर्भ ग्रंथ सूची:
(1) धूमिल की कविता में विरोध और संघर्ष, नीलम सिंह, आवरण पृष्ठ १
(2) धूमिल की कविता में विरोध और संघर्ष, नीलम सिंह, भूमिका, पृष्ठ ५
(3) धूमिल के काव्य में सामाजिक चेतना, डॉ० उपासना, शोध मंथन, पृष्ठ ६३
(4) धूमिल के काव्य में सामाजिक चेतना, डॉ० उपासना, पृष्ठ ९
(5) समकालीन हिन्दी कविता, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, राजनीति और विरोध की कविता, पृष्ठ २३४
(6) संसद से सड़क तक, धूमिल, बीस साल बाद, पृष्ठ १४
(7) संसद से सड़क तक, धूमिल, पटकथा, पृष्ठ १०६
(8) आधुनिक कवि, विश्वंभर मानव, पृष्ठ २८७
(9) सुदामा पाण्डेय का प्रजातंत्र, धूमिल,भूमिका, विद्यानिवास मिश्र, पृष्ठ २
(10) कल सुनना मुझे, धूलिम, धूमिल की अंतिम कविता, पृष्ठ ८७
(11) संसद से सड़क तक, धूमिल, पटकथा, पृष्ठ १२५
(12) आधुनिक कवि, विश्वंभर मानव, पृष्ठ २९२
(13) संसद से सड़क तक, धूमिल, मोचीराम,पृष्ठ ४०
(14) धूमिल की कविता में विरोध और संघर्ष, नीलम सिंह
पृष्ठ ६६, वहीं ६९
(15) समकालीन कविता पर धूमिल का प्रभाव, डॉ० हर्षबाला, पृष्ठ ७
(16) समकालीन हिन्दी कविता, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, राजनीति और विरोध की कविता, पृष्ठ २३७, वहीं २४३
(17) धूमिल के काव्य में सामाजिक चेतना, डॉ० उपासना,पृष्ठ ७०_७१
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