मातृभाषा - कविता - सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
रविवार, मई 10, 2026
मातृभाषा होती है
माँ की तरह
स्नेह देने वाली।
जब जाता है इंसान
किसी दूर-दराज़ इलाके में
नौकरी की तलाश में,
तो वहाँ की भाषा
वहाँ के लोग
उसे लगते हैं अजनबी।
लेकिन उन हज़ारों की भीड़ में
कोई एकाध ही उसे मिल जाता है
उसकी मातृभाषा बोलने वाला
तो उसे लगता है
कि वो वापिस आ गया है
अपनी माँ की गोद में।
लेकिन आज का सच यह है, कि–
माँ को वृद्धाश्रम में छोड़ देने वाली
आज की पीढ़ी,
छोड़ देती है अपनी मातृभाषा को भी
और अंग्रेज़ी के साथ
आगे बढ़ जाती है।
क्योंकि उन्हें मिस्टर शामनाथ की
माँ और मातृभाषा लगती हैं–
'अनप्रज़ेन्टेबल'।
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