नंदनी खरे 'प्रियतमा' - छिंदवाड़ा (मध्यप्रदेश)
टूटे पंख - कविता - नंदनी खरे 'प्रियतमा'
रविवार, मई 10, 2026
एक चिरैया थी बाग़ों में,
अभी तो उड़ना सीख रही थी।
अपने कोमल कोमल स्वर में,
अभी कुहुकना सीख रही थी।
उड़ने को कोशिश में चिड़िया,
सारा दिन बस खेला करती।
अपनी पहली मधुर कुहक से,
हर दिन नया नवेला करती।
अपनी मीठी मीठी भाषा,
जब वह बोला करती थी।
सबको सुखमय कर के फिर,
पर अपने खोला करती थी।
वह धीरे धीरे जान रही थी,
अपने पंखों की ताक़त को।
मगर भुला न सकती थी,
कोमलता और नज़ाकत को।
एक दिन उड़ते-उड़ते,
वह बस अम्बर छूने वाली थी।
उसने सोचा घर लौटूँ,
कि रात होने वाली थी।
जल्दी जल्दी अपने घर को,
डरी-डरी-सी चल पड़ी।
उस रात मन में धीरज धर,
अकेली ही निकल पड़ी।
राहों में अकेली देख उसे,
कुछ जंगली कुत्ते भौंक पड़े।
और कुछ उल्लू मिलकर,
उसके नए पंख नौंच पड़े।
वह उतना चीख़ी,
जितना चीख़ा जा सकता था।
मगर उसकी कोमल वाणी से,
कितना चीख़ा जा सकता था।
उस रात मेरी सोनचिरैया,
सिसक-सिसक कर रो रहीं थी।
उसकी सुनता कौन वहाँ,
सारी जंगली गलियाँ सो रही थी।
वह भाग निकलना चाहती थी,
जंगल की उन राहों से।
वह भाग निकलना चाहती थी,
उन उल्लुओं की बाहों से।
मगर भाग न सकी चिरैया,
उल्लू ने उसके पर तोड़े।
कहीं भाग न जाए,
इसलिए पैर तक भी ना छोड़े।
वो मीठी बातों वाली,
अपने घर की नन्ही परी।
भूख का शिकार हो,
पड़ी हुई थी अधमरी।
अधमरा-सा देख उसे,
फिर बाज़ों ने भी ना छोड़ा।
उसके बचे हुए जीवन को,
मिल मिलकर सबने तोड़ा।
घर पहुँच कर मरूँ सोच,
थोड़ा घिसट कर रह गई।
खोकर अपने पंख पखेरू,
माटी में लिपट कर ढह गई।
अपनी अंतिम साँस में चिड़िया,
सपनों में घुट कर रह गई।
फिर कोशिश की उड़ने की,
पर वहीं सिमट कर रह गई।
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