अश्रु सर्वथा जीते होंगे - कविता - राघवेंद्र सिंह
शनिवार, मई 09, 2026
अश्रु सर्वथा जीते होंगे,
उत्कंठित स्वर हारा होगा।
प्रणत दृष्टि से जब भी हे प्रिय!
तुमने हमें निहारा होगा।
अश्रु सर्वथा जीते होंगे,
उत्कंठित स्वर हारा होगा।
पीड़ा के उन गहरे क्षण में,
कैसा यह स्नेह का बंधन।
पहले जिनमें प्रणय गीत था,
उनमें शेष रहा स्पंदन।
नत पलकों में विरह भाव है,
स्मृतियाँ निःशब्द पड़ी हैं।
नूपुर-सम टूटे हैं स्वप्न सब,
व्याकुलताएँ तनी खड़ी हैं।
उन्हीं विकलताओं से जब भी,
तुमने हमें पुकारा होगा।
अश्रु सर्वथा जीते होंगे,
उत्कंठित स्वर हारा होगा।
जिस दिन दो पथ हुए अलग थे,
उनका मिलना बड़ा कठिन था।
विष का फिर अमृत हो जाना,
शुभे! सरल नहीं बड़ा कठिन था।
प्रणय गीत का पृष्ठ वो अंतिम,
अब वह पूर्ण कभी न होगा।
प्रेम डोर में बँधा हृदय यह,
अब संपूर्ण कभी न होगा।
मिलन भाग्य में लिखा नहीं प्रिय,
तुमने यह स्वीकारा होगा।
अश्रु सर्वथा जीते होंगे,
उत्कंठित स्वर हारा होगा।
जीवन की यह रीत पुरानी,
कभी बदल न यह पाएगी।
युगों-युगों की प्रेम-कहानी,
स्मृति बनकर रह जाएगी।
जिस दिन मौन अधर की पीड़ा,
श्वासों तक वो लाई होगी।
मन की चीख़ स्वयं ही उस दिन,
पन्नों पर ही आई होगी।
ऐसी विरह व्यथा को जिस क्षण,
कवि ने स्वयं उभारा होगा।
अश्रु सर्वथा जीते होंगे,
उत्कंठित स्वर हारा होगा।
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