डोरी से बंधी आज़ाद पतंग - कविता - निवेदिता

सोच रही हूँ,
क्यों ना आज अपना परिचय दे दूँ।
मैं पतंग,
हाँ वही आसमान में उड़ने वाली,
ऊँचाइयों को छूने वाली।
सोच रही हूँ
क्यों न आज हक़ीक़त को जी लूँ।
मैं वही, शांत आकाश से ख़ूब बतियाने वाली,
अनंत में ख़ुद की पहचान बनाने वाली,
सोच रही हूँ,
क्यों न आज दबे जज़्बात उगल दूँ।
कितनी ख़ुश लगती हूँ ना मैं हवाओं में अठखेलियाँ करती,
कितनी बे-फ़िक्र और बेबाक लगती हूँ,
सोच रही हूँ,
क्यों ना आज अपनी डोर से रिश्ता तोड़ लूँ।
फिर क्या औक़ात होगी डोर बिना मेरी,
कौन-सी उड़ान और कौन-सी ऊँचाई,
सोच रही हूँ,
क्यों ना अपनी दिखावटी ख़ुशी को एक बार परख लूँ।
देख रहे हो ये मेरी चोट के निशान?
कोई जगह नहीं जहाँ ज़ख़्म न हो,
सोच रही हूँ,
क्यों ना आज दर्द से कराह लूँ।
डोर तो फिर भी परवाह कर रही है,
मेरी आज़ादी के लिए ख़ुद कट रही है,
सोच रही हूँ,
क्यों ना आज डोर की आज़ादी के लिए अपना दम तोड़ दूँ।
कितना निष्ठुर होगा वो क़िस्मत में उड़ान लिखने वाला,
पहचान में मेरी आसमान लिखने वाला,
सोच रही हूँ,
क्यों ना आज बीन पहचान पतंग हों लूँ।


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