पार्क की चोरी - कहानी - डॉ॰ ममता मेहता

पार्क की चोरी - कहानी - डॉ॰ ममता मेहता | Hindi Kahani - Park Ki Chori - Dr Mamta Mehta
छनाक... छन छननन की आवाज़ आई, मैं समझ गया देश की भावी क्रिकेट टीम के भावी धुरंधर बल्लेबाजों ने अपना कमाल दिखा दिया है। मैं बाहर भागा। देखा तो धुरंधर बल्लेबाजों की धुआँधार बैटिंग की छाप मेरी खिड़की पर नहीं तिवारी जी की खिड़की पर पड़ी थी। यह देखकर मैं सुकून से बड़े इत्मीनान से चलते हुए तिवारी जी के पास पहुँचा... "क्या हुआ तिवारी जी कुछ गड़बड़ हो गई क्या?"
तिवारी जी भड़क कर बोले "देख रहे हैं ना आप शर्मा जी! देख रहे हैं ना यह मोहल्ले के लड़कों ने जीना हराम कर रखा है। आए दिन खिड़की के शीशे तोड़ते रहते हैं, अब नया काँच कौन लगवाएगा? इनका बाप!"
मैंने उन्हें टोका "अरे तिवारी जी इतना ग़ुस्सा ठीक नहीं है, यह देश के भावी क्रिकेटर है, देश का नाम रोशन करने वाले हैं, ज़रा सोचिए कल को जब यह टीवी पर इंटरव्यू देंगे तो आपका भी तो नाम होगा जब यह कहेंगे कि हम तिवारी जी के खिड़की के काँच तोड़-तोड़ कर इतने बड़े बने हैं।"
तिवारी जी मुँह बना कर बोले "तो दो-चार शीशे आप भी तुड़वा लो, आप का भी नाम हो जाएगा।"
मैंने कहा "आप तो ख़्वाह-मख़ाह नाराज़ हो रहे हैं बताइए अब बच्चे बच्चे बेचारे खेले तो कहाँ खेले?"
बच्चे भी चिल्लाए "बताइए हम कहाँ खेले?"
तिवारी जी बोले "कहीं भी खेलो पर आगे से मेरे घर के आसपास भी नहीं फटकना वरना अच्छा नहीं होगा"
फिर मेरी तरफ़ पलट कर बोले "इतने पार्क, इतने मैदान पड़े हैं शहर में खेलने के लिए पर इन्हें यह गली ही मिलती है।"
मैंने कहा "वैसे तिवारी जी जब हमारी यह कॉलोनी कटी थी तो इसमें एक पार्क की जगह भी थी। हम आप और सब लोग मिलकर एक काम करते हैं उस पार्क वाली जगह पर पार्क बनवाने के लिए नगर पालिका में एक एप्लीकेशन दे देते हैं। जब पार्क बन जाएगा तो बच्चे गली में नहीं बल्कि पार्क में खेला करेंगे।"
तिवारी जी अभी उस बात के मूड में नहीं थे इसलिए बेमन बोले "वह सब ठीक है आप सबको बता कर साइन ले लीजिए पर यह बताइए कि मेरी खिड़की का काँच कौन ठीक करवाएगा?"
मैंने बात बदली "अरे चलिए पहले एक एप्लीकेशन लिखकर सबसे साइन ले लेते हैं फिर आपकी इस समस्या के बारे में भी सोचेंगे"
हमने एप्लीकेशन लिखी साइन लिए और नगरपालिका जाकर बड़े बाबू को दे दी। बड़े बाबू बिना देखे एप्लीकेशन पेपरवेट के नीचे दबा कर बोले "दो दिन बाद आना।"
हम दो दिन बाद पहुँचे तो बड़े बाबू ने कहा "अभी इंस्पेक्शन चल रहा है आप तीन-चार दिन बाद आइए।"
हम तीन-चार दिन बाद पहुँचे हैं तो वे इंस्पेक्शन के बाद थके हुए थे तो और तीन-चार दिन बाद आने के लिए कहा। हम और तीन-चार दिन के बाद पहुँचे। बड़े बाबू ने ढूँढ़ कर एप्लीकेशन निकाली, देखी, कॉलोनी का नाम देखा, कहीं से ढूँढ़ कर एक फ़ाइल निकाली फ़ाइल का मुआयना किया और हथेली टेबल पर पटक कर बोले- "पर पार्क तो इस कॉलोनी में ऑलरेडी बना हुआ है।"
सब एक-दूसरे का मुँह देखने लगे।
"नहीं बड़े बाबू वहाँ पर कोई पार्क नहीं है"
बड़े बाबू ने नक्शा दिखाया।
"यह देखिए यह बना हुआ है यहाँ पर पार्क।"
सिन्हा साहब बोले "बड़े बाबू! यह तो नक्शे में है। वहाँ ओरिजिनल में तो कोई पार्क नहीं है।"
बड़े बाबू जोश में बोले "है कैसे नहीं चलिए चल कर देखते हैं।"
हमने कहा "हाँ हाँ आप ख़ुद ही चल कर देख लीजिए वहाँ पार्क है या नहीं।"
बड़े बाबू नक्शा लेकर पार्क देखने चल पड़े। वहाँ पहुँच कर देखा वाक़ई वहाँ पार्क नहीं था। बड़े बाबू ने नक्शा देखा। नक्शे के हिसाब से तो पार्क वही होना था पर नहीं था। बड़े बाबू ने तंबाकू मलते हुए घोषणा कर दी "पार्क यहीं था, नहीं है इसका मतलब पार्क चोरी हो गया... अब आपको पहले तो थाने में रिपोर्ट लिखवानी पड़ेगी पार्क चोरी की। पहले तो आप थाने में रिपोर्ट लिखवाइए कि पार्क चोरी हो गया है। चलिए मैं भी चलता हूँ।"
सब थाने पहुँचे। वहाँ बड़े बाबू ने थानेदार को नक्शा दिखा कर स्थिति से अवगत कराया, थानेदार ने गंभीरता से नक्शा देखा और  कहा "हुँ! इसका मतलब है कि पार्क चोरी हो गया। ठीक है! रिपोर्ट तो लिखनी पड़ेगी पर ये बताइए कि आपने पार्क को देखा था?"
हमने समवेत स्वर में कहा- "नहीं"
थानेदार ने कहा "तो फिर मैं रिपोर्ट कैसे लिखूँ?"
हमने कहा "हमने तो नहीं देखा पर यह बड़े बाबू कह रहे हैं तो इन्होंने देखा होगा।"
थानेदार ने बड़े बाबू से पूछा "आपने देखा था?"
बड़े बाबू ने नक्शा सामने रख दिया... हाँ साब देखा था, देखिए ऐसा दिखता था पार्क।"
थानेदार ने हमसे पूछा "आपको किसी पर शक है किसने चुराया होगा पार्क?"
वर्मा जी ने कहा "जब हमने पार्क देखा ही नहीं तो हम यह भी कैसे कह सकते हैं कि पार्क किसने चुराया होगा? क्यों भाइयों..." हमसब ने कहा "हाँ, वर्मा जी बिल्कुल सही कह रहे हैं, जब हमने पार्क देखा ही नहीं तो कैसे कहें कि किसने चुराया?"
थानेदार ने डंडा ठकठकाया "देखिए जब बड़े बाबू कह रहे हैं कि पार्क वहाँ था तो पार्क तो होगा ही, अब जब वहाँ नहीं है तो मतलब साफ़ है कि किसी ने चुरा लिया। अब आप एक ज़िम्मेदार नागरिक की तरह हमें सहयोग दीजिए और बताइए कि आपको किस पर शक है पार्क किसने चुराया?"
मैंने कहा "अरे थानेदार साहब! आप समझ नहीं रहे हैं। हम कह रहे हैं कि यहाँ पार्क था ही नहीं, मतलब पार्क तो बना ही नहीं, मतलब किसी ने उसे देखा ही नहीं तो वह चोरी कैसे हो सकता है? थानेदार साहब! वह पार्क वहाँ था ही नहीं वह सिर्फ़ नक्शे में ही बनकर रह गया है।"
थानेदार साहब ने डंडा हथेली पर ठकठकाया "अच्छा मतलब हम नासमझ हैं! नहीं! आप हमें समझाएँगे की क्या चीज़ है क्या नहीं है? कौन सी चीज़ असल में है कौन सी चीज़ नक्शे में है... हाँ! हम तो यहाँ घास खाकर बैठे हुए हैं, हमें तो कुछ समझता ही नहीं है। सारी समझ आप में भरी हुई है।"
मैं गड़बड़ा गया "नहीं मेरा मतलब वो नहीं था आप ग़लत समझ रहे हैं।"
थानेदार उसी लहज़े में बोला "बहुत मतलब मतलब कर रहे हैं आप, आपका मतलब मैं अच्छी तरह समझ रहा हूँ। आप भी मेरा मतलब समझ लीजिए। इस जगह पर पार्क नहीं बन सकता क्योंकि यहाँ ऑलरेडी पार्क बन चुका है। यहाँ पार्क नहीं है इसका मतलब पार्क चोरी हो गया है तो नया पार्क बनाने के बजाए यह पता लगाना पड़ेगा कि पार्क किसने चुराया... समझे आप! चलिए अब उस जगह चलते हैं जहाँ से पार्क चोरी हुआ था। घटनास्थल की सारी रिपोर्ट लेनी पड़ेगी।"
हम फिर उस जगह पहुँचे जहाँ कथित पार्क बना था। वहाँ थानेदार ने पूरा मुआयना किया फिर कहा "देखिए यहाँ जितने भी सुराग़ बिखरे पड़े हैं वह यही साबित करते हैं कि यहाँ पार्क था जो चोरी हो गया है।"
हम सब एक दूसरे का मुँह ताकने लगे।
"हम सच कह रहे हैं थानेदार साहब! हमने तो यहाँ पार्क कभी देखा ही नहीं।"
थानेदार साहब ने कहा "यही तो हिंदुस्तान का दुर्भाग्य है कि यहाँ आम जनता कुछ देखती ही नहीं बस आँखें बंद करके पड़ी रहती है। अगर आप अपनी आँखें खुली रखते तो आपको पार्क भी दिखता और यह देखकर कि आप देख रहे हैं कोई पार्क को चुराकर नहीं ले जाता। देखिए आप ही देखिए आपकी लापरवाही की वजह से कोई पार्क चुरा कर ले गया और आपको पता भी नहीं चला।"
आम जनता की लापरवाही पर लेक्चर और लंबा चलता कि आवाज़ आई "जूना पुराना लोहा पेपर की रद्दी ले... खाली बोतल, डब्बा, बाल्टी ले..."
उसके चिल्लाने को बीच में ही टोका थानेदार ने "ऐ.. इधर आ"
"हाँ बोलो साब!" वह अपना ठेला संभालता आया।
"तूने पार्क चुराया है?" थानेदार ने डपट कर पूछा।
वो अचकचा कर देखने लगा
"क्या साब?"
थानेदार ने घुड़का "अबे समझ में नहीं आ रहा क्या, हिंदी ही बोल रहा हूँ तूने पार्क चुराया है... पार्क... पार्क बगीचा..." 
वो बौखला गया "भला बगीचा कोई कैसे चुरा सकता है साहब वह तो इतना बड़ा..."
थानेदार ने बीच में डपटा "चुप साले मुझ को समझा रहा है तू... सीधे से बता तूने चुराया है या नहीं?"
ठेले वाले ने हाथ जोड़े "नहीं साहब मैंने नहीं चुराया।"
थानेदार ने डाँट कर कहा "अच्छा हमसे झूठ बोलता है जब थाने ले जाकर दो डंडे पड़ेंगे तो सारा सच बाहर आ जाएगा चल थाने..."
वह ना ना करता रहा और उसे थाने ले गए।
हम कहते रहे कि यह चोर नहीं है, इसने पार्क नहीं चुराया और वह यह कह कर कि "ठीक है थाने ले जाकर उसका बयान लिख कर छोड़ देंगे'' उसे ले गए बाद में पता चला कि उन्होंने सब्जी वालों, लोहा लंगर वालो और साइकल का पंक्चर दुरस्त करने वालों को पार्क की चोरी के इल्ज़ाम में जेल में बंद कर दिया।
नक्शे में पार्क बन चुका था इसलिए हमारी कॉलोनी में असली में पार्क नहीं बना। और अब पार्क की जो ज़मीन थी उस पर मंत्रीजी की एक शानदार कोठी खड़ी थी। देश के भावी क्रिकेटर गली मोहल्ले में खेल कर अपनी बॉलिंग बैटिंग की प्रैक्टिस कर रहे थे।

डॉ॰ ममता मेहता - अमरावती (महाराष्ट्र)

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