कितने वीर क़ुर्बान हुए - कविता - डॉ॰ कंचन जैन 'स्वर्णा'

आज़ादी की ख़ातिर कितने वीर क़ुर्बान हुए,
कितनों ने अपने घर के दीए खोए,
कितने ही शहीद हुए।
यूँ ही नहीं मिली आज़ादी,
हे भारतवासीयों!
कितनी ही वीरों के लहू के क़तरों से,
भीगी हुई है भारत की वादियाँ।
यूँ ही नहीं लहरा परचम विश्व में भारत का,
इस तिरंगे की ख़ातिर,
ना जाने कितने सपूत क़ुर्बान हुए।
यूँ ही नहीं रोशन आज,
हर घर के स्वतंत्र दीए हैं,
ना जाने कितनी ही दीए,
स्वतंत्रता के लिए,
भारत की माँओं ने खोए हैं।

डॉ॰ कंचन जैन 'स्वर्णा' - अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश)

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