एक सुबह होने दो मेरी स्मृति में - कविता - सुरेन्द्र प्रजापति
सोमवार, जुलाई 10, 2023
एक सुबह होने दो मेरी स्मृति में
उगने दो रक्तिम आभा की तरह एक सुरज
मेरे स्मृति के बंजर में
मेरा सीना अनुपजाऊ ज़मीन है
कट चुका जंगल, मरुस्थल का विस्तार है
अपने नाखुन से मिट्टी कोड़ो
स्पर्श से हवा का रुख मोड़ो
बो दो हवा में सुख का बीज
सीने पर प्रेमकुसुम खिलने दो
बूँदो से सींचो, धरती से मिलने दो।
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