चाहत - कविता - गणेश दत्त जोशी

तेरी ख़ुशबू से पल-पल 
महकता रहा है मेरा,
भला और क्या मैं चाहूँ?
हर क्षण हर पल बस तेरा ही साथ माँगूँ।
तू ही तो बसा है मेरे रोम-रोम में,
हृदय की धरती धड़कन के व्योम में,
फिर तुझसे अलग मैं कैसे रह पाऊँ?
भला और मैं क्या चाहूँ?
मेरा सपना तू है,
मेरा अपना भी तू है,
मन नदियाँ में तेरी ही बातें
लेती हैं हिलोर,
क्रन्दन भी तेरा 
अभिनंदन भी तेरा
तेरा ही तो वंदन है।
कैसे फिर किसी और का सुमिरन कर पाऊँ?
भला और क्या मैं चाहूँ?
तेरे से हैं साँसें मेरी,
तेरे से चलता रगो में
ये रक्त प्रवाह,
तू ही तो है जिससे जगमग है मेरा संसार।
तू ही तो है हृदय वटवृक्ष पर राज जो करता है,
तू ही तो है थामता मुझे
जब भी विकल होता हूँ,
तू ही तो है अश्रु पोछता, जब-जब मैं रोता हूँ।
कैसे फिर मैं तुझे ख़ुद से अलग कह पाऊँ?
भला और मैं क्या चाहूँ?

गणेश दत्त जोशी - वागेश्वर (उत्तराखंड)

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