रविन्द्र दुबे 'बाबु' - कोरबा (छत्तीसगढ़)
हिंदी भाषा - घनाक्षरी छंद - रविंद्र दुबे 'बाबु'
मंगलवार, सितंबर 13, 2022
हिन्दी भाषा जानो! हिन्द जो है मेरा अभिमान,
मातृभू की वंदनीय, भाषा सुखदायी है।
सरल सहज तान, स्वर लय माला गीत,
पहचान हमारी जो, हिन्दी सुरदायी है।
भारतीय गुणगान, कह पाते सदा कवि,
काल जीते कालजयी, छंद वरदायी है।
सागर संग गागर भर लाते सुर मीरा,
इतिहास विरासत, हमे बतलाई है।
हिन्दी से दिन हमारी, हर काम हो इसी में,
रात निंदि लोरी सुने, वो दीप की बाती है।
राजनीति की ताक़त जनता मान कराती,
हिन्दी भाषा की ख़ातिर, हिंद की हो जाती है।
हिन्दी के उपयोग से, स्याही मान बढ़ा रहे,
निज भाषी मित्र बने धरा भी गाती है।
देव भाषा से उपजा, आओ! हम अपनाएँ,
राष्ट्र ज्ञान शील सम, हिन्दी दोहराती है।
साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिए साहित्य से जुड़ी Videos
साहित्य रचना कोष में पढ़िएँ
विशेष रचनाएँ
दीपावली विशेष रचनाएँ: कविता, गीत, दोहे और मुक्तक का सुंदर संकलन
सुप्रसिद्ध कवियों की देशभक्ति कविताएँ
अटल बिहारी वाजपेयी की देशभक्ति कविताएँ
फ़िराक़ गोरखपुरी के 30 मशहूर शेर
दुष्यंत कुमार की 10 चुनिंदा ग़ज़लें
कैफ़ी आज़मी के 10 बेहतरीन शेर
कबीर दास के 15 लोकप्रिय दोहे
भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? - भारतेंदु हरिश्चंद्र
पंच परमेश्वर - कहानी - प्रेमचंद
मिर्ज़ा ग़ालिब के 30 मशहूर शेर

