तुम कविता का पूर्ण भाव हो - कविता - राघवेंद्र सिंह

मैं कविता की प्रथम पंक्ति हूंँ,
तुम कविता का पूर्ण भाव हो।
मैं तो केवल तुकबंदी हूंँ,
तुम लहरों में रस बहाव हो।

मैं शब्दों का गठबंधन हूंँ,
तुम शृंगारित अलंकार हो।
मैं हूंँ कविता का परिचायक,
तुम कविता का पूर्ण सार हो।

मैं कविता का एक सुमन हूंँ,
तुम कविता का पूर्ण बाग़ हो।
मैं फूलों की एक कुमुदनी,
तुम भौरों का प्रेम राग हो।

मैं कविता का अंश मात्र हूंँ,
तुम कविता का दिव्य प्राण हो।
मैं कविता का निमित्त मात्र हूंँ,
तुम कविता का ही प्रमाण हो।

मैं कविता की सरल वाहिनी,
तुम कविता का पूर्ण सिन्धु हो।
मैं कविता का तृण मात्र हूंँ,
तुम कविता का केंद्र बिन्दु हो।

राघवेन्द्र सिंह - लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

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