बसेरा - कविता - नेहा श्रीवास्तव

बीत रहा था एक विहग सुषमय जीवन
उड़ जाता था दूर गगन में स्वप्न सँजोए
जीवन उसको लगता सुन्दर, सरस, मनोहर
हरा भरा वन नील गगन और सुन्दर उपवन
सब लगते उसको अपने था आनन्दित मन
प्रात निकलकर अपना दाना चुग आता था 
साँझ ढले फिर आ जाता था जहाँ बसेरा 
भान नहीं था छुपा शान्ति में कौन बवंडर 
ज्ञान नहीं था उसको कैसे लगता है डर 
आई एक दिन जोर की आँधी लुटा बसेरा 
फैल गया हर ओर घनघोर अँधेरा 
पेड़ गिरे शाखाएँ टूटी उजड़ा उपवन 
रहा कहाँ अब पहले जैसा सुषमय जीवन 
कर विलाप कहता ईश्वर से विहग अभागा 
ये कैसा दुर्भाग्य समय की कैसी करवट 
किया नहीं अपकार कभी भी किसी का मैंने 
फिर किस कारण आए इतने दुःख जीवन में 
सुख और दुःख का चक्र मुझे कुछ समझ न आता 
तुम सब जानो मेरे विधाता दुःख क्यों आता सुख क्यों जाता 
क्यूँ फैले हैं इतने काँटें जिनमें उलझा जीवन मेरा
इन बीहड़ झंझावातों में कैसे बसाऊँ अपना बसेरा।

नेहा श्रीवास्तव - प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)

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