होली आई होली आई - कविता - अनिल भूषण मिश्र

होली आई होली आई,
चारों ओर मदमस्त बहारें लाई।
महुआ कूचे आम बौराई,
प्रफुल्लित हो उठी है सारी अमराई।।
होली आई होली आई

कोयल ने पंचम स्वर की तान लगाई,
सबके मन में बज रही मीठी शहनाई।
कामदेव ने हर तरफ़ है अपनी फ़ौज सजाई।।
होली आई होली आई

लेकर रंगभरी पिचकारी होलियारों की टोली आई,
हर युवती बनी है राधा, हर युवक बना कन्हाई।
सबने मिलकर होली की है रास रचाई।।
होली आई होली आई

बन रही है घर घर गुझिया और दुधभंगा,
होकर अलमस्त चले नहाने सब रंगों की गंगा।
जहाँ भी देखो वहाँ जुटे हैं रंगों के दंगाई।।
होली आई होली आई

बज रहें हैं चहुँ ओर ढ़ोल नगाड़े और मजीरा,
झूम रहें सब फागुन धुन पर बन अलमस्त फकीरा।
करें हुड़दंग एक दूजे को रंग गुलाल लगाई।।
होली आई होली आई

बूढ़ों ने भी भरी जवानी की अँगड़ाईं,
अब तो इनको हर नारी दिखती भौजाई।
पर नहीं हैं कम इनसे एक लुगाई।।
होली आई होली आई

दोनो दल ने एक दूजे पर रंग खूब उड़ाई,
गालों पर भी रहे गुलाल लगाई।
धरती पर आज महारास की शोभा है छाई।।
होली आई होली आई

बूढ़े बच्चे युवा सभी हैं होली में बौराई,
भूषण देते नए साल की सबको आज बधाई।
सबके मन में नई उमंग है छाई।।
होली आई होली आई

अनिल भूषण मिश्र - प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)

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