स्वर बिन सूना - कविता - विनय विश्वा

मन भावे है
जीवन जोत जागे।
कर वीणा हो
सुर की गंगा बहे।
ज्ञानदायनी
हंसवाहनी माते
तेरे बिना ये
जग सूना लागे है।
न सुर कंठे
जगत लागे गूंगे।
तेरे होने से
सृष्टि गुंजायन है।
तू ही आधार
कवि व कलाकार।
जय जय माँ
तू ही सृष्टि आधार
कर जीव उद्धार।
    
माँ तेरा प्यार
खुशियों की बहार
आँचल तेरे
आऊँ मैं बारंबार
माँ तेरा प्यार
खुशियों की बहार
सुनी हो गयी 
हमरी जिनगिया
माँ छोड़ जाएँ
हमरी अंगुरीया
कासे के कहूँ
माँ हो तोरे आंचल
मैं नहीं पायो।
सूनी हो गयी धाम
तोहें न पाऊँ।
मोहे दुख न देखें
जग संसार
मोहे रुप न भायो
जगको मैं त्यागो।

विनय विश्वा - कैमूर, भभुआ (बिहार)

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