अमरत्व - कविता - वर्षा श्रीवास्तव

देवता अमर होना चाहते थे,
असुर भी मरना नहीं चाहते थे
सृष्टि के संतुलन के लिए
अच्छे को ज़िन्दा रहना था।

आख़िर देवता अमर हो गये
किन्तु मनुष्य न तो देव था, न असुर।

उसे मिला अवसर
अमरत्व का, या मर जाने का
सिर्फ़ अपने कर्म के माध्यम से।

श्रेष्ठ मनुष्य ने चुना अमर होना
उन्होंने की महान खोजें,
महान कार्य,
किए महान सृजन
तब कहीं उन्हें अमरत्व का घूँट मिला।

मनुष्य जो नहीं कर सका ऐसा कुछ
वो मरा, सिर्फ़ कुछ की यादों में शेष होकर।

देवताओं ने मनुष्य को अमर नहीं होने दिया
असुरों ने मनुष्य को मरने नहीं दिया।
दिया अवसर उसे
ज़िन्दा न रहकर भी,
ज़िन्दा रहने का।
आखिर मनुष्य देवत्व व असुरत्व के मध्य
सदियों से चुन रहा हैं
अमर होना, या मर जाना।

वर्षा श्रीवास्तव - छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश)

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