मिहिर! अथ कथा सुनाओ (भाग २५) - कविता - डॉ. ममता बनर्जी "मंजरी"

(२५)
भारत हुआ आजाद, मिहिर मुस्काकर बोले।
पल दो पल के बाद, किरण पट अपना खोले।
बोले ततपश्चात, हुए मन ही मन गर्वित।
झूम उठा था प्रांत, तहेदिल होकर पुलकित।।


डफली मांदर ढोल, बजी थी ढम-ढम-ढम-ढम।
लगा जयहिंद बोल, भरे जन साँसों में दम।
नृपेंद्र नाथ शाहदेव, देश का मान बढ़ाए।
लंदन में तत्काल, तिरंगा थे फहराए।।


देख रहा था विश्व, तिरंगे को लहराते।
अद्भुत था वह दृश्य, भुलाए नहीं भुलाते।
लाल किला इक ओर, इंडिया हाउस दूजे।
होकर भाव विभोर, भारती माँ को पूजे।।


कृष्ण चंद्र जी दास, पहाड़ी मंदिर आए।
शतवीरों के नाम, तिरंगा थे लहराए।
बच्चें हुए अवाक, तिरंगा देख रहे थे।
भारत ज़िंदाबाद, निरंतर बोल रहे थे।।


तुमने किया प्रणाम, तिरंगे को हे दिनकर!
भारत माँ के नाम, लगा जयकारा दिनभर।
भारत जय-जयकार, हमें करना सिखलाओ।
ममता करे गुहार, मिहिर! अथ कथा सुनाओ।।


डॉ. ममता बनर्जी "मंजरी" - गिरिडीह (झारखण्ड)


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