वो नींद - नज़्म - हरि ओम राजपूत

वो नींद मुझे जब आती थी, सोने से पहले सोने तक !
वो कई गुजारी रातें थी, वो भोर सुनहरी किरणों तक !!

वो ख्वाब तुम्हारे आते थे, आकर फिर कतराते थे !
वो देख तुम्हारी जुल्फों को, थोड़ा हम मुस्काते थे !!

वो गई चाँदनी रातों में, जब तुम ऐसे मुस्काती थी !
वो मैं जब थोड़ा मुस्काता था, तब तुम थोड़ा इतराती थी !!

वो महसूस मैं जब करता था, खुद को तेरी बाँहों में !
वो दर्द निकल सब जाते थे, एक साथ ही आँहों में !!

वो साथ गए जब वृन्दावन को, मिलन बिहारी बांके को !
वो देख वहाँ की अतिसुंदर छवि को, (बोलीं) मंदिर देखूँ या राधे को !!

वो देख वेणुधर मुरली को, आँखें जैसे स्वर्ग निहारे !
वो राधा की चाह बनें, या रुक्मिणी के सितारे !!

जब पहुँचा यमुना तट पर, मन का गीत गा बैठा था !
वो नटखट मोर पंखों वाला, उससे प्रीत लगा बैठा था !!

वो रुक्मिणी भी कहती होंगी, मेरे प्रियवर मेरे मीत !
वो कितनी किस्मत वाली राधा, जिससे तुम करते थे प्रीत !!

वो ठोड़ी पर काले तिल को, देख गोपियाँ मन मटकायें !
वो छलिया मन मुस्काता, अधर पर वेणु टिकाये !!

वो गोकुल में गाय चराते, याद करें तब यशुदा मैया !
बिन राधा व्याकुल मोहन, तड़प-तड़प रह जय कन्हैया !!

वो याद कर मोहन की व्याकुलता, मेरा मन घबराता है !
वो बोलीं चलते है घर, मेरा भी मन घबराता है !!

वो यादें, वो सपनें, वो उम्मीदें सब हो गये बेकार !
वो वादे, वो कसमें, वो हिम्मत सब हो गए लाचार !!

वो याद करूं मैं पल भर को, वो बीते दिनों अनमोल जवानी !
वो सहज रास आँखों में भर कहतीं, याद करो न वहीं कहानी !!

वो अनदेखे, वो अनजाने से, अब तुमको प्यारे लगते हैं !
वो दुनिया देखी अबंर चूमा, पर खुद से हारे लगते हैं !!

वो याद तुम्हारी आती है, कहने से पहले कहने तक !
वो आँखें ओझल हो जाती हैं, जब बोलूँ मैं पहला मुक्तक !!

वो नींद मुझे जब आती थी, सोने से पहले सोने तक !
वो कई गुजारी रातें थी...........!

हरि ओम राजपूत - संडीला, हरदोई (उत्तर प्रदेश)

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