युवा का प्रलाप - गीत - दिवाकर शर्मा "ओम"

भारत का यूवा कहता है ,
निश दिन वह यह गम सहता है ।
ताने सहता है इस जग के ,
अपनी प्रतिभा उर में रख के ।
वह भारत का शक्ति बिन्दु है ,
नव युग का वह वृहद सिंधु है ।
वह इस युग के कर्णधार हैं ,
इन अंशों पर कल सवार है ।
उनकी अस्मिता पर प्रहार का, हम कैसे व्याख्यान दें ।
हम लायक हैं कितने और प्रमाण दें ।।

इन युवा में राम छिपे हैं ,
कृष्ण और बलराम छिपे हैं ।
इन युवा एकलव्य सम ,
धनुर्धुरंधर वाण छिपे हैं ।
छिपा हुआ है त्याग शिवा का ,
विक्रम का वह न्याय छिपा है ।
गिन डाले जो दांत सिंह के,
ऐसा भरत महान छिपा है ।
इनकी प्रतिभा पर पर्दे का, अब कोई समाधान दें ।
हम लायक हैं कितने और प्रमाण दें ।।
 
हम भी चाहें देश बढ़े अब ,
खेले कूदे खूब फले अब ।
भारत माँ का शिर ऊंचा हो ,
हर दम स्वच्छ गली कूंचा हो ।
श्रेष्ठ बिंदु पर भारत जाए ,
विश्वगुरु फिर वह कहलाये ।
लेकिन कुछ जो प्रश्न सघन हैं,
लावा जैसे उर में दफन हैं ।
फूट पड़े जो ज्वाला बन कर, उनका कैसे बयान दें ।
हम लायक हैं कितने और प्रमाण दें ।।

हर सीढ़ी हम चढ़ते आये ,
पग पग नित्य सम्हलते आये ।
अग्नि परीक्षा दे देकर के ,
कुंदन सम हम तपते आये ।
अब केवल ढलना बाँकी है ,
अन्तिम पग चलना बाँकी है ।
अन्तिम पग पर विवस खड़े हैं,
सब सपने कुछ दूर पड़े हैं ।
उन सपनों को पाने से, पहले न कोई व्यवधान दें ।
हम लायक हैं कितने और प्रमाण दें ।।
 
यदि भर्ती आ जाए चुपके ,
समझो रहम है ये सब रब के ।
तब भर्ती में फॉर्म डालें ,
फिर पेपर ना होने वाले ।
पेपर हो जाए गलती से ,
कोर्ट में जातीं है भर्ती ये ।
लगा लगा के कोर्ट के चक्कर, हम क्या अपने प्राण दें ।
हम लायक हैं कितने और प्रमाण दें ।।

दिवाकर शर्मा "ओम" - हरदोई (उत्तर प्रदेश)

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