याद-ए-माज़ी के तसव्वुर से ही डर जाते हैं - ग़ज़ल - आले इमरान लखनवी

याद-ए-माज़ी के तसव्वुर से ही डर जाते हैं
ज़ख्म जो तूने दिए थे वो उभर जाते हैं, 

झूठ जो बोलते रहते हैं मुसलसल मुझ से 
ऐसे अफ़राद मिरे दिल से उतर जाते हैं, 

ये सिकंदर ने जनाज़े से दिखाया अपने
हाथ ख़ाली ही वहाँ ले के बशर जाते हैं, 

यूँ तो उल्फ़त का किया करते वो दावा, लेकिन
बात होती है अमल की तो मुकर जाते हैं, 

ग़म की शब हो या मसर्रत का सवेरा कोई 
लम्हे कैसे भी हों इमरान गुज़र जाते हैं, 

शब्दार्थ:
याद-ए-मज़ी - बीते हुए दिनों की याद | मुसलसल - लगातार | अफ़राद - लोग | जनाज़ा - अर्थी | बशर - इंसान | उल्फ़त - प्यार | अमल - कार्य | मसर्रत - ख़ुशी

आले इमरान लखनवी - लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

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