बच्चों के बिन घर सूना है - गीत - शिव शरण सिंह चौहान 'अंशुमाली'

बच्चों के बिन घर सूना है - गीत - शिव शरण सिंह चौहान 'अंशुमाली' | Geet - Bachchon Ke Bin Ghar Soona Hai. बच्चों पर गीत
बच्चों के बिन घर सूना है
बच्चे दूध बतासा।
घुल जाते हैं अन्तर्मन में
भर जाते हैं आशा।

उनसे ही जीवन की डोरी
वह भविष्य की अभिलाषा।
प्रगति पंथ के सूत्र यही हैं
प्रसन्नता की परिभाषा।

उन्नत जीवन बनता इनसे
बड़े प्यार से पालो।
पढ़ा लिखा अनुशासन वीथी
पर ही इन्हें संभालो।

चले गए यदि दूर कहीं तो
मन उदास हो जाता।
बाबा-पापा मम्मी के स्वर
कोई अरे! बुलाता।

पर मैं तो हूँ आह! अकेले
मन को मैं समझाता।
ईश्वर उनको स्वस्थ बनाए
यही प्रार्थना नित गाता।

प्रगति पंथ पर इन्हें बढ़ाओ
ईश्वर दे दो संबल।
छाया बनो 'अंशुमाली' प्रभु
जैसे माँ का अंचल।

शिव शरण सिंह चौहान 'अंशुमाली' - फ़तेहपुर (उत्तर प्रदेश)

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