आत्मग्लानि - कविता - प्रवीन 'पथिक'
सोमवार, अप्रैल 27, 2026
सोचता हूॅं, हार जाऊॅं उन लम्हों से,
जिनसे लड़ते झगड़ते साल बीते।
टूट कर बिखर गया जिनके लिए यूँ,
हाथ खाली, हाल भी बदहाल ही थे।
स्वप्न पाने के लिए सब खो दिया मैं,
बुझती आशाओं को देख रो दिया मैं।
कुछ न हासिल हुआ, मुझे जगत से,
एकाकीपन का बीज यूँ बो दिया मैं।
क्या ख़ता हुई, न जान सका मैं!
अपनों को ही न पहचान सका मैं।
सोचता, हृदय तो चकनाचूर होता,
ऐसा भी नहीं कि नादान था मैं।
चाहता, बहुत कुछ बदल-सा जाता,
होता विरोध पर, वह पा ही जाता।
हर दिन जिसके लिए जलता है सीना,
ऑंसू और ग़म न जिसमें रह ही पाता।
हर ख़्वाहिश जब अधूरी रह गई,
दुःख ही जीवन की कथा कह गई।
पाया न ऐसा जिस पर नाज़ करता,
ज़िंदगी हर क्षण व्यथाएँ सह गई।
अफ़सोस कर हाथ मलता रह गया,
सीने में इक दर्द पलता रह गया।
चाहत तो अब जैसे कुछ रही नहीं,
ऑंखों में चिंगारी जलता रह गया।
काश हम कभी ऐसे मिले न होते,
काश चाहत के फूल खिले न होते।
ज़िंदगी तो ख़ैर यूँ भी कट ही जाती,
काश कभी ये शिकवे गिले न होते।
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