नई सड़क - कविता - मयंक द्विवेदी
सोमवार, अप्रैल 27, 2026
जैसे सोलह शृंगार कर
एक नवनवेली दुल्हन-सी
जब गाँव में सड़क आती है
बड़े-बुज़ुर्गों, बच्चों, युवाओं—
सबके मन को भाती है।
कोई कौतूहल में दाँतों तले
अंगुली दबाता है, कोई—
बस निहारना चाहता है
जैसे हर कोई मुँह दिखाई
की रस्म निभाना चाहता है।
नई सड़क नई दुल्हन-सी
जैसे बरसों कुँवारे की प्रतीक्षा हो
जैसे किसी बुज़ुर्ग की जीवन भर
कच्ची पगडंडियों-सी ज़िम्मेदारी से
राहत का फ़रिश्ता हो।
जैसे किसी सासु की
नई दुल्हन से जुड़ी प्रतिष्ठा हो उस उम्मीद में
हर कोई उसे जी भर कर देखना चाहता है।
आख़िर नई सड़क भी नई दुल्हन-सी
नए घर की ज़िम्मेदारी निभा जो रही है।
कभी बच्चों को स्कूल छोड़ने
बूढ़ों को अस्पताल पहुँचाने
जैसे नौजवानों के दिल की धड़कन
बढ़ाती गुनगुनाती कोई तरुणी—
बलखाती-लचकाती जा रही है।
वैसे नई सड़क नई दुल्हन-सी
हर सूने घर में ख़ुशियाँ ला रही है।
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