ख़ुश्क तबियत हरी नहीं मिलती - ग़ज़ल - गिरेन्द्र सिंह भदौरिया 'प्राण'

ख़ुश्क तबियत हरी नहीं मिलती - ग़ज़ल - गिरेन्द्र सिंह भदौरिया 'प्राण' | Ghazal - Khushk Tabiyat Hari Nahin Milti
अरकान : फ़ाइलुन फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन
तक़ती : 212  212  1222

ख़ुश्क तबियत हरी नहीं मिलती, 
और फिर रसभरी नहीं मिलती। 

लोग कहते कि चाँदनी देखो, 
चाँदनी साँवरी नहीं मिलती। 

नाज़ नख़रे हज़ार होते हैं, 
रूपसी बावरी नहीं मिलती। 

नाज़नीनों को भटकते देखा, 
आप सी सहचरी नहीं मिलती। 

हूर तक को उतार लेता पर, 
आप जैसी परी नहीं मिलती। 

इश्क़ नमकीन हुस्न मीठा है, 
प्रीति भी चरपरी नहीं मिलती। 

'प्राण' की प्यास आख़िरी होगी, 
ज़िन्दगी दूसरी नहीं मिलती। 

गिरेंद्र सिंह भदौरिया 'प्राण' - इन्दौर (मध्य प्रदेश)

Join Whatsapp Channel



साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिए साहित्य से जुड़ी Videos