शौचालय - अवधी गीत - संजय राजभर 'समित'

नाही शौचालय त् नाही गवनवा, 
मोरे सजनवा 
हे! मोरे सजनवा 
बनवा दीं बेचके गहनवा। 

नारी के सिंगार हऊवे, नारी के हया। 
ऐकरा बचा लीं राजा, बना जनि बेहया। 

नाही रुपइया गाड़ी, नाही बंगलवा 
मोरे सजनवा 
हे! मोरे सजनवा 
बनवा दीं बेचके गहनवा।

लुच्चा लफंगन के, झाड़ी में बसेरा, 
बतिया के समझा राजा, भईल बा सबेरा। 

नाही घी रोटी चाही, नाही मालपुअवा। 
मोरे सजनवा 
हे! मोरे सजनवा 
बनवा दीं बेचके गहनवा।

हीत नात घरे जब त् , मनवा लजा ला। 
मुँहे-मुँहे लोगवा के, बतिया खिचा ला। 

नाही सेज मलमल के, नाही वसनवा। 
मोरे सजनवा 
हे! मोरे सजनवा 
बनवा दीं बेचके गहनवा।


Join Whatsapp Channel



साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिए साहित्य से जुड़ी Videos