रूह तक को भी छू गया वो मेरे - ग़ज़ल - रंजना लता

अरकान : मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन
तक़ती : 1222  122  122  122

रूह तक को भी छू गया वो मेरे,
वो ख़ुशबू है, चाँदनी है, दुआ है, क्या है?

ज़िंदगी में भर दी है रौशनी उसने,
वह प्रभा है, जुगनू है, दीया है क्या है?

बिन माँगे मिली है चाहत उसकी,
वो इश्क़ है, जुनूँ है, वफ़ा है, क्या है?

वह कहता नहीं बस दिए जाता है,
वो शजर है, धूप है, हवा है, क्या है?

महसूस होता है पर दिखता नहीं,
वो साँस है, धड़कन है, ख़ुदा है, क्या है?

ख़ुद को फ़ना कर पाया है उसे,
वो रास्ता है, मंज़िल है, अरमाँ है क्या है?

भिंगोया है मेरे दिल की ज़मीं को,
वो शबनम है, क़तरा है, बरखा है, क्या है?

उसकी बातें जैसे सरगम हो कोई,
वो गीत है, ग़ज़ल है, कविता है, क्या है?

आख़िर क्यों इतनी मोहब्बत है उससे,
वो ख़्वाब है, ख़्वाहिश है, दुनिया क्या है?

बस डूबती ही जा रही है लता उसमें,
वो झील है, समंदर है, दरिया है, क्या है?

रंजना लता - समस्तीपुर (बिहार)

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